उनके पास चोर रास्ते हैं, आपके पास नियम नहीं; पहाड़ों पर मनमानी और अनदेखी पड़ रही भारी

पहाड़ किसी भी राज्य का हो उसे चंद घटनाओं के बाद मौत की घाटी कहा जाना न तो राज्य की छवि के साथ न्याय है और न पर्यटन के लिए। याद रखना चाहिए कि जहां नियम का अभाव होता है वहां यम के लिए पथ सरल हो जाता है।

Sanjay PokhriyalThu, 28 Oct 2021 10:03 AM (IST)
प्रशासन को सूचित कर और भौगोलिक परिस्थितियों की जानकारी लेकर ही करें पहाड़ों की सैर। फाइल

कांगड़ा, नवनीत शर्मा। बात दो छोटे-छोटे उदाहरणों के साथ आरंभ करते हैं। गाजियाबाद का रहने वाला एक युवक हिमाचल आया। उसके लिए आकर्षण के दो पक्ष थे। पहला यह कि उसे हिमाचल का प्राकृतिक सौंदर्य देखना था और दूसरा उसे देखना था इतनी ऊंचाई पर बना अभियांत्रिकी का अनुपम उदाहरण यानी अटल रोहतांग सुरंग, लेकिन वह जैसे ही सुरंग के दूसरे छोर यानी लाहुल की ओर पहुंचा, उसे किसी ने बताया कि यहां से छह-सात किलोमीटर दूर एक झील है, जिसका नाम है अल्यास झील। वह अकेला ही निकल गया। रात को बर्फबारी हुई और वह फंस गया। कुछ लोगों को पता चला कि एक व्यक्ति फंसा है। सिस्सू के पूर्व प्रधान मनोज कुमार अपने साथियों के साथ वहां पहुंचे और उसे बचाया। दूसरा उदाहरण उस वीडियो का है जिसमें गायक कैलाश खेर अपने किसी दोस्त के भेजे अनुभव के लिए देवभूमि हिमाचल प्रदेश के लोगों की प्रशंसा कर रहे थे। बताया गया कि लाहुल-स्पीति के लोगों ने बर्फ में फंसे पर्यटकों की बहुत सहायता की।

दोनों उदाहरण देवभूमि में मनुष्यता के उपस्थित होने की बात कर रहे हैं जिस पर गर्व किया जा सकता है, लेकिन इन्हीं उदाहरणों में व्यवस्था की गुमशुदगी भी दर्ज हो रही है। व्यवस्था पर्यटन में भी साहसिक पर्यटन को व्यवस्थित करने की। ट्रैकिंग और पैरा ग्लाइडिंग दोनों साहसिक पर्यटन से जुड़े पक्ष हैं। बीते दिनों हिमाचल में पैरा ग्लाइडिंग के दौरान एक व्यक्ति की मौत हो गई। उत्तराखंड में भी कई पर्यटक ऐसे दुर्गम क्षेत्रों में फंसे नजर आए, जहां जाने की कल्पना करना उन लोगों के लिए भी कठिन है, जो उत्तराखंड या हिमाचल में रहने का दावा करते हैं, लेकिन आजकल ट्रैवल एजेंसियां विशेषज्ञ बन गई हैं। उनके पास न कोई गाइड होता है और न ऐसे लोग साथ होते हैं, जिन्हें भौगोलिक परिस्थितियों की जानकारी हो। विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश, दोनों इस प्रकार के धंधे से परेशान हैं। पर प्रश्न यह उठता है कि राज्यों ने अपने-अपने स्तर पर पर्यटकों के पंजीकरण के लिए क्या प्रबंध किए हैं। हिमाचल प्रदेश में किसी को कुछ पता नहीं होता कि कौन किस रास्ते से पहाड़ को नापने निकल गया है। बाद में आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, सेना, हेलीकाप्टर के लिए आवाजें दी जाती हैं। ट्रैकिंग के लिए मान लिया कि एक उपमंडल दंडाधिकारी ने अनुमति दे दी या उसके कार्यालय को पता है कि अमुक व्यक्ति यात्रा कर रहा है, पर दूसरे एसडीएम को यह पता नहीं होगा कि अमुक व्यक्ति ने कब उनके अधीन क्षेत्र में प्रवेश किया।

हिमाचल प्रदेश में गाइड को यह बताया जाता है कि अच्छे से व्यवहार करो, स्थानीय चीजें बताओ। यह नहीं बताया जाता कि मुसीबत में कैसे न फंसें..और यदि फंस जाएं तो क्या करें। किन्नौर में बीते दिनों तीन पर्यटकों के शव मिले, जबकि गाइड सुरक्षित वापस पहुंच गए थे। यह कैसा मार्गदर्शन है? चोर रास्तों पर नजर रखना बेहद कठिन है, लेकिन एक व्यवस्था तो बनाई जा सकती है कि नाम दर्ज करवाया जाए, जीपीएस ट्रैकिंग नहीं है, ड्रोन नहीं हैं, जबकि पुलिस चौकी भी होनी चाहिए। जब पर्यटक फंसते हैं, छोटे से छोटा हेलीकाप्टर भी दो से तीन लाख रुपये प्रति घंटा की दर से उपलब्ध होता है। यह केवल हेलीकाप्टर का खर्च है, इसमें पुलिस या अन्य पक्षों से जुड़े मानव संसाधन व अन्य संसाधनों का गणित अलग है।

क्यों नहीं स्थानीय स्तर पर युवाओं को प्रशिक्षित किया जाए? क्यों न उन्हें मार्गदर्शक की भूमिका में लाया जाए और आपदाओं से जूझने, निगरानी रखने के लिए तैयार किया जाए? पर्यटन जब हिमाचल प्रदेश के लिए संभावना संपन्न क्षेत्र है तो क्यों न कुछ निवेश इस तरह से किया जाए कि मानव बल भी तैयार हो और पर्यटकों को भी भरोसा रहे कि वे सुरक्षित हाथों में हैं। कांगड़ा के बीड़ बिलिंग में हवा थम जाती है, सूर्यदेव सुस्ता कर रात की घोषणा कर देते हैं, लेकिन उड़ान वाले नहीं थकते। अंधेरे में उड़ना इसे ही कहते हैं। वहां निगरान कौन है? साडा यानी विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण का एक व्यक्ति। वह कितनी गाड़ियां याद रखेगा? किस किस को रोकेगा? पहाड़ किसी भी राज्य का हो, उसे चंद घटनाओं के बाद मौत की घाटी कहा जाना न तो राज्य की छवि के साथ न्याय है और न पर्यटन के लिए। याद रखना चाहिए कि जहां व्यवस्था या नियम का अभाव होता है, वहां यम के लिए पथ सरल हो जाता है।

[राज्य संपादक, हिमाचल प्रदेश]

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