खूब हुई छेड़छाड़, आओ अब करें धरा का शृंगार

विकास के नाम पर पहाड़ों का सीना धड़ल्ले से छलनी किया जा रहा है। बड़े-बड़े भवन खड़े हो गए हैं। ढलानों पर बने भवन सड़क तक ही कई मंजिल के हो जाते हैं। पर्यटक स्थलों पर जहां नाले होते थे वहां पर भी भवन बन गए हैं।

Vijay BhushanThu, 15 Jul 2021 07:54 PM (IST)
मैक्लोडगंज में अतिक्रमण के कारण संकरा हुआ नाला। जागरण

नीरज आजाद, धर्मशाला। व्यस्त जिंदगी से कुछ पल निकाल कर पहाड़ों की सैर के लिए आने वाले पर्यटक यहां कंक्रीट के जंगल खड़े देख स्तब्ध रह जाते हैैं। हरियाली के बीच बैठने के लिए अब लोग को पहाड़ों पर दूर तक जाना पड़ता है। अब तो वहां तक भी पहुंच हो गई हैं जहां कुछ वर्ष पहले तक जाने की सोच भी नहीं सकते थे। विकास के नाम पर पहाड़ों का सीना धड़ल्ले से छलनी किया जा रहा है। बड़े-बड़े भवन खड़े हो गए हैं। ढलानों पर बने भवन सड़क तक ही कई मंजिल के हो जाते हैं। पर्यटक स्थलों पर जहां नाले होते थे वहां पर भी भवन बन गए हैं। उन नालों को या तो बंद कर दिया गया है या उनका रास्ता ही सीमित कर दिया है।

विकास के नाम पर प्रकृति से हुई छेड़छाड़ का नतीजा आपदा के रूप में देखना पड़ रहा है। मौसम चक्र बदल गया है। सर्दियों में बर्फ कम और बरसात में बारिश को तरसना पड़ता है। गर्मियों के महीने भी बदल रहे हैं। भूमाफिया, वन माफिया, खनन माफिया सब प्रकृति पर प्रहार कर रहे हैं। वन माफिया पेड़ों को काट रहा, भूमाफिया भवन इत्यादि बना रहा है जबकि खनन माफिया धरती को खोखला करने में जुटा है। जिन लोगों पर प्रकृति के संरक्षण का जिम्मा है, वे देखकर भी सब कुछ अनदेखा कर जाते हैं। राजनीति से जुड़े लोग वोट बैैंक के चक्कर में खामोश रहते हैैं। ये लोग उठाएंगे भी नहीं क्योंकि इसमें अपने शामिल होते हैं।

पहाड़ की बनावट पर अध्ययन जरूरी

सड़कें विकास के लिए जरूरी हैं। यह बननी भी चाहिए लेकिन इनके निर्माण से पूर्व वैज्ञानिक आधार अवश्य देखा जाना चाहिए। जिन पहाड़ों को काटा जा रहा है, उनकी बनावट के बारे में भी जानना जरूरी है। पहाड़ों को किस कोण से काटा जाना चाहिए उसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए। सड़क निर्माण के दौरान जो ढलानें बनती हैं उन पर पौधे भी लगाए जाने चाहिए।

रोजगार का सुख, मलबे से दुख

पहाड़ों पर कई परियोजनाएं स्थापित हुई हैं। यह सुखद है कि इनसे रोजगार मिला है और राज्य की आर्थिकी को भी संबल मिला है लेकिन इनके निर्माण के दौरान निकलने वाले मलबे के सही निस्तारण की व्यवस्था नहीं हो पाई है। नदी नालों के किनारे डंपिंग की जा रही है। इससे न केवल पानी का बहाव बाधित होता है बल्कि इन नदियों पर बनी जलविद्युत परियोजनाओं पर भी असर पड़ रहा है। बांधों में बड़ी तेजी से सिल्ट जमा हो रही है। इसी तेजी से डंपिंग होती रही तो इन नदियों पर बनी परियोजनाएं समय से पहले ही ठप हो जाएंगी।

चंद दिनों की सक्रियता, फिर सुस्ती

बहुत कम लोग प्रकृति के संरक्षण के बात करते हैं लेकिन उनकी आवाज किसी के कानों तक नहीं पहुंचती। अदालत के जब हस्तक्षेप करती है तो कुछ कार्रवाई अवश्य होती है लेकिन फिर सब शांत हो जाते हैं। प्रकृति बार-बार लोगों को चेता रही है लेकिन कोई इसे गंभीरता से नहीं ले रहा है। जानमाल के नुकसान पर सिर्फ उन्हीं के आंसू नहीं सूखते जिनका सब तबाह हो जाता है। हादसे के समय कई लोग आश्वासन, सांत्वना देते हैं लेकिन फिर कोई याद नहीं रखता। जिसे जख्म मिले हैं, दर्द उसी को सहना होगा।

भागसूनाग से सबक सीखें

चार दिन पहले मैक्लोडगंज के भागसूनाग व पठानकोट-मंडी एनएच की घटना ने भी बता दिया कि पानी अपना रास्ता अवश्य लेता है। इसमें बेशक समय लग जाए। अधिक देर नहीं हुई है। अब भी समय है। जरूरत है हर पक्ष के जागने की, प्रकृति के संरक्षण के लिए सभी योगदान देंगे तो इसका संरक्षण भी हो सकेगा। इस बरसात अधिक से अधिक पौधे लगाएं। धरा के शृंगार के लिए सब योगदान दें तो प्राकृतिक आपदाओं का खतरा भी टल जाएगा।

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