केसर की खेती के लिए प्रशिक्षित किए अधिकारी

-वर्चुअल मोड़ में जुड़े चंबा किन्नौर कुल्लू कांगड़ा मंडी और शिमला जिला के 15 से अधिक अ

JagranSun, 20 Jun 2021 02:43 AM (IST)
केसर की खेती के लिए प्रशिक्षित किए अधिकारी

-वर्चुअल मोड़ में जुड़े चंबा, किन्नौर, कुल्लू, कांगड़ा, मंडी और शिमला जिला के 15 से अधिक अधिकारी

संवाद सहयोगी, पालमपुर : केसर प्राचीन काल से भारतीय व्यंजनों का स्वाद बढ़ाता आया है। वर्तमान में यह जम्मू और कश्मीर के पंपोर और किश्तवाड़ क्षेत्रों में उगाया जाता है। कश्मीर से बाहर इसकी खेती को बढ़ावा देने के लिए, सीएसआइआर, आइएचबीटी पालमपुर ने शुक्रवार को कृषि अधिकारियों के लिए, हिमाचल के गैर-पारंपरिक क्षेत्रों में केसर की खेती पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें चंबा, किन्नौर, कुल्लू, कांगड़ा, मंडी और शिमला जिलों के 15 से अधिक अधिकारी वर्चुअल मोड़ के माध्यम से शामिल रहे।

प्रशिक्षण कार्यक्रम में सीएसआइआर, आइएचबीटी निदेशक डा. संजय कुमार ने बताया कि लगभग 2,825 हेक्टेयर भूमि के क्षेत्र से केसर का वार्षिक उत्पादन छह से सात टन तक पहुंच जाता है, जो भारत की वार्षिक मांग (100 टन) को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है, इसलिए मसाला बाजार में 2.5-3.0 लाख प्रति किलो के प्रीमियम मूल्य पर बेचा जाता है। घरेलू मांग को पूरा करने के लिए सबसे अधिक केसर ईरान से आयात किया जा रहा है। सीएसआइआर-आइएचबीटी हिमाचल प्रदेश के राज्य कृषि विभाग के साथ मिल कर एक परियोजना पर काम कर रहा है, जिसका उद्देश्य केसर की खेती को बढ़ावा देना और कश्मीर से बाहर भी महत्वपूर्ण विशिष्ट क्षेत्रों की पहचान करना है, जो भारत को केसर उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा।

डा. कुमार के अनुसार, अच्छी गुणवत्ता, रोगमुक्त फूल आकार के कीट (बीज) केसर उत्पादन की मुख्य बाधा है। इस समस्या को दूर करने के लिए सीएसआइआर-आइएचबीटी में अत्याधुनिक नई टिश्यू कल्चर सुविधा का निर्माण किया जा रहा है, जो सालाना 3.5 लाख रोग मुक्त कीट पैदा करने में सक्षम होगी। परियोजना के वरिष्ठ प्रधान विज्ञानी सह प्रधान अन्वेषक डा. राकेश कुमार ने प्रशिक्षण कार्यक्रम का संचालन किया और साइट के चयन, कृषि प्रौद्योगिकी, कटाई के बाद के प्रसंस्करण और जैविक और अजैविक तनाव प्रबंधन के बारे में विस्तार से चर्चा की। रासायनिक रूप से केसर में तीन मुख्य यौगिक होते हैं: क्रोसिन, पिक्रोक्रोकिन और सफ्रानल, जो इसके रंग, स्वाद और सुगंध के लिए जिम्मेदार होते हैं।

उन्होंने भरमौर, चंबा में तीसा, किन्नौर में सांगला घाटी, कुल्लू में निरमंड, कांगड़ा जिला में बड़ा भंगाल क्षेत्र के गैर-पारंपरिक क्षेत्रों में केसर की खेती के महत्व पर जोर दिया, जहां इसके उत्पादन के लिए उपयुक्त जलवायु है जो किसानों को पारंपरिक फसलों से अधिक लाभ दे सकती है। केसर 1500-2800 मीटर की ऊंचाई पर शुष्क समशीतोष्ण जलवायु में अच्छी तरह से बढ़ता है। फूलों के लिए, सर्दियों के दौरान बर्फ से ढका क्षेत्र उपयुक्त होता है। 23 से 27 डिग्री सेल्सियस पुष्पन और कार्म उत्पादन के लिए इष्टतम तापमान है। सुप्तावस्था के बाद फूलों के उत्पादन के लिए कार्म को 17 डिग्री सेल्सियस के तापमान की आवश्यकता होती है। इस कार्यक्रम में कृषि अधिकारियों ने अपने अनुभव साझा किए और सीएसआइआर-आएचबीटी और कृषि विभाग, सरकार के बीच केसर की संयुक्त परियोजना के तहत प्रदेश में केसर उगाने संबंधी किसानों की समस्याओं पर चर्चा की।

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