हिमानी चामुंडा मंदिर के रास्तों में नहीं देखी अभी भी विकास की राह, श्रद्धालु पथरीले रास्‍ते पर चल कर रहे मां के दर्शन

हिमानी चामुंडा मंदिर रास्ते के लिए कई योजनाएं बनीं लेकिन धरातल पर अभी तक कुछ भी नहीं हो पाया। अभी भी श्रद्धालुओं को 14 किलोमीटर की दुगर्म तथा पथरीले रास्तों से मां के दर्शनों को जाना पड़ता है। मंदिर जाने के लिए लोग दो रास्तों का उपयोग करते हैं।

Richa RanaFri, 17 Sep 2021 08:51 AM (IST)
हिमानी चामुंडा मंदिर रास्ते के लिए कई योजनाएं बनीं, लेकिन धरातल पर अभी तक कुछ भी नहीं हो पाया।

योल, सुरेश कौशल। आदि हिमानी चामुंडा मंदिर रास्ते के लिए कई योजनाएं बनीं, लेकिन धरातल पर अभी तक कुछ भी नहीं हो पाया। अभी भी श्रद्धालुओं को 14 किलोमीटर की दुगर्म तथा पथरीले रास्तों से मां के दर्शनों को जाना पड़ता है। मंदिर जाने के लिए लोग दो रास्तों का उपयोग करते हैं, एक जदरांगल से ओर दूसरा जिया से है। जिया का रास्ता कुछ हद तक ठीक तो है। लेकिन समय रहते उचित मरम्मत तथा रखरखाव से उबड़ खाबड़ हो कर रह गया है।

जदरांगल से वाया भौट तीखा रास्ता अभी भी सुधारने की राह देख रहा है ‌। कई बार सांसद निधि से बजट का प्रावधान कर रास्ते को बनाने की कवायद शुरू तो हुईं। लेकिन आधा अधूरा कार्य तक ही सिमट कर रह गया ‌। हालांकि मंदिर प्रशासन ने रास्ते पर भौट ओर कोटलू स्थलों को चिन्हित कर मिनी विश्राम हट बनाने के लिए भी बजट का प्रावधान किया, लेकिन वन भूमि आड़े आ गई। ‌कई फीट की ऊंचाई पर धौलाधार पर्वत श्रृंखला की तलहटी में चंद्रधार श्रृंखला पर स्थित आदि हिमानी चामुंडा मंदिर धार्मिक ही नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक महत्व भी रखता है। लेकिन जब रास्ते ही सही नहीं तो धार्मिक पर्यटन को विकसित करने का सपना कैसे पूरा हो पाएगा । कई धार्मिक संगठनों ने हिमानी चामुंडा मंदिर को वैष्णो देवी मंदिर की तर्ज पर विकसित करने की मांग भी की । लेकिन जब रास्ते ही चलने लायक न हो तो मंदिर का विकास कैसे हो सकता। आलम यह है कि मौजूदा समय में अनुमानित 1.04करोड रुपये की लागत से मंदिर का पुनर्निर्माण कार्य जोरों पर चला हुआ है ‌। यह तभी शोभायमान लगेगा जव यहां आवाजाही की सुविधा मिल सके ।

क्या है ऐतिहासिक महत्व

आदि हिमानी चामुंडा एक ऐतिहासिक महत्व भी रखता है ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌ यहां 1670ईस्वी के दौरान राजा चन्द्र भान ने मुगल सेना से लोहा लेने के लिए हिमानी चामुंडा में आकर शरण ली थी और मुगल सेना को परास्त भी किया था।वो मां के अनन्य भक्त थे । फ़रवरी 2013 के दौरान एक प्राकृतिक आपदा के चलते प्राचीन मंदिर का गर्भगृह जल कर राख हो गया था ‌। 2017के दौरान मदिर के पुनर्निर्माण का कार्य शुरू हुआ। मंदिर में लाखों का वार्षिक चढ़ावा दर्ज किया जाता है ।

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