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खबर के पार: शिक्षण संस्‍थानों के मौजूदा हालात उठा रहे सवाल, किताबों ने क्या दिया मुझको

धर्मशाला, नवनीत शर्मा। आखिर एक कक्षा में होता ही क्या है? कुछ बेंच, चॉक और श्याम पट्ट यानी ब्लैक बोर्ड। इनके बीच में कुछ आवाजें होती हैं। एक आवाज गुरुगंभीर होती है और उसके सामने वाली कई आवाजें कच्ची होती हैं। उस कच्ची मिट्टी की तरह जिससे आप गोल पत्थर बना सकते हैं या फिर कोई नुकीला हथियार भी। आप सकारात्मक हैं तो कुछ ऐसी आकृतियां भी बन सकती हैं जो सुंदर कल्पना को साकार करें। इस बीच ब्लैक बोर्ड का रंग लगातार स्याह होता गया है।

शायद इसलिए कि उस पर उकेरे जाने वाले शब्दों की सफेदी कम हो गई है। यहां सफेदी बरकरार भी रहे तो भी सामने वाले जिन घरों से आते हैं, समाज के जिस हिस्से से आते हैं, वे उन शब्दों की चमक के बारे में बात नहीं करते। जहां अत्याधुनिक सूचना तकनीक से लैस कक्षाएं हैं, वहां ब्लैक बोर्ड सिर्फ इतिहास के एक अक्षम और चुके हुए प्रहरी की तरह ही दिखता है।

...इस सबके बीच अचानक हिमाचल प्रदेश खड़ा हो जाता है। वही हिमाचल प्रदेश जिसने सितंबर और अक्टूबर में चार ऐसी घटनाएं दर्ज की हैं जिनसे शिक्षा के मंदिरों में अव्यवस्था की हाजिरी दिखी है। यहां केवल शिक्षकों का दोष नहीं, उस मानसिकता का दोष है जो अमन काचरू की शहादत को भूल चुकी है। मानसिकता... जो बेटों की कारगुजारी पर नजर नहीं रखती... बेटियों से अपेक्षा करती है कि सूरज ढलने से पहले घर आ जाएं। सोच यह है कि बेटे जो भी कर लें, उनका क्या बिगड़ता है। अमन काचरू डॉ. राजेंद्र प्रसाद राजकीय मेडिकल कॉलेज टांडा में प्रशिक्षु था। करीब एक दशक पहले रैगिंग का शिकार हो गया था। उसके बाद न्यायपालिका समेत देश की हर बड़ी संस्था जाग उठी थी। समितियां बनी थी, सिफारिशें आई थीं...।

कोई बता सकता है कि इसके बावजूद क्यों वरिष्ठ छात्रों की हेकड़ी का भोजन कनिष्ठ छात्र बनते रहे? सबसे पहले बहुतकनीकी संस्थान हमीरपुर में रैगिंग हुई, उसके बाद कांगड़ा में और उसके बाद ऊना के एक राष्ट्रीय स्कूल यानी जवाहर नवोदय विद्यालय में। हमीरपुर और कांगड़ा के संस्थानों के अध्यापक वर्ग ने कनिष्ठ छात्रों की पीड़ा को समझा और आरोपितों के नाम पुलिस को दिए। बात सामने आई तो चेतना जगाने में मदद भी हुई। यही ऊना के जवाहर नवोदय विद्यालय में भी हुआ। बहुतकनीकी संस्थानों में तो कुछ छात्र बतौर पीजी भी रह रहे थे लेकिन जिस जवाहर नवोदय विद्यालय का सब कुछ गेट के भीतर होता है, वहां ऐसा होना दुर्भाग्यपूर्ण है। जिस स्कूल को अनुशासन के लिए जाना जाता था, वहां यह सब होना विश्वास का दरकना है। चौथी घटना कांगड़ा के गंगथ स्कूल की है जहां एक अध्यापक पर लगे आरोप शिक्षा जगत को शर्मसार करते हैं।

बहरहाल, रैगिंग गंभीर अपराध है, इस संदेश के शब्द अमन काचरू की हत्या के दस साल बाद इतने क्षीण हो जाएंगे, यह कल्पना से परे है। सवाल यह है कि शिक्षा के लिए आवश्यक तीन पक्ष क्या अपना दायित्व निभा रहे हैं? विद्यार्थी, अध्यापक और अभिभावक। संभव है कहीं एक या दो पक्ष ठीक से निभा रहे हों। यह बेहद कम है कि तीन के तीन पूरी शिद्दत के साथ निभा रहे हों। जहां यह संभव होता है, वहां नई पीढ़ी बेहतर मनुष्य भी बनती है और वह सब भी बन जाती है जो उसे बनना होता है। वर्दी और मिड डे मील क्या कर लेगी अगर सही और गलत का अंतर ही सीख न पाएं। विभिन्न सर्वेक्षणों की रपटें कितनी आंखें खोलती हैं, यह रहस्य नहीं है।

सतत् एवं समग्र मूल्यांकन के नाम पर लगातार उत्तीर्ण करते चलना जीवन के मोर्र्चे पर अनुत्तीर्ण रह जाने की क्रिया भर है। कहीं अभिभावक चिंतित नहीं हैं तो कहीं विद्यार्थी कुमार्ग पर चल रहा है। कहीं अध्यापक अपनी राह भूल रहा है। गंगथ विद्यालय में जो हुआ, वह हमारे क्षरित होते मूल्यों का एक वीभत्स दृश्य है। एक प्रवक्ता पर ये आरोप लगें कि वह अंक देने के एवज में छात्राओं के साथ अनुचित व्यवहार या ऐसी कुछ बात करता था तो यह सही समय है कि ब्लैक बोर्ड और उसके सामने के लोगों के बीच के संबंध को देखा जाए। यह पहला मामला नहीं है। जांच ही बताएगी कि पूरी बात क्या है, लेकिन ग्रामीणों का आक्रोश, छात्राओं की पीड़ा का कुछ अर्थ तो होगा। दुखद यह है कि आज तक शिक्षा विभाग ऐसा तरीका खोज नहीं पाया कि शिक्षकों की कारगुजारी का अपने स्तर पर पता करे।

चार अतिरिक्त गतिविधियां करना और फिर स्वयं ही पुरस्कार के लिए आवेदन करना कोई बहादुरी नहीं है। अध्यापकों की भर्ती में मनोविशेषज्ञों की भूमिका बढ़ाने की आवश्यकता इसलिए भी है ताकि अध्यापक वही बने, जिसमें गुरु जैसी गुरुता हो। जो स्वयं भी एक अच्छा विद्यार्थी हो। इस सब में समाज की भूमिका भी कम नहीं है। आखिर बच्चे कहां जाएं? घर में कोई साज संभाल नहीं ...बाहर चिट्टा बेचने वाले हैं...अंदर का हाल यह है कि अब अध्यापक ही आरोपित बन रहे हैं.. क्या व्यवस्था नई वर्दी की तरह छीज नहीं रही है? क्या वास्तव में शिक्षा को जितनी गंभीरता मिलनी चाहिए, वह मिल रही है? यही कारण है कि एक बड़े वर्ग का सपना अब क्लर्क और पटवारी बनने तक सीमित हो गया है।

क्या यह आने वाले हिमाचल के संकेत हैं? अगर यह है तो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। यही समय है कि हिमाचल प्रदेश अपनी प्राथमिकताएं तय करे। शिक्षक या विद्यार्थी दिवस के बजाय शिक्षा दिवस हो जो रोज मनाया जाए। और इसका आधार केवल आचरण हो। उत्तीर्ण होना तो बड़ी बात नहीं.. वह तो शिक्षा बोर्ड के सौजन्य से ऐसे निजी केंद्र भी हैं जहां यह हमेशा संभव है। हर बात किताब में नहीं होती...नजीर बाकरी ने यूं ही नहीं कहा है :

खड़ा हूं आज भी रोटी के चार हर्फ लिए

सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझको

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