Kullu Dussehra: माता हिडिंबा के कुल्‍लू पहुंचने पर ही शुरू होता है अंतरराष्‍ट्रीय दशहरा उत्‍सव, जानिए मान्‍यता

International Kullu Dussehra दशहरा उत्सव में शिरकत करने राज परिवार की दादी माता हिडिम्बा कुल्लू जाने के लिए तैयार हो गई हैं। माता हिडिम्‍बा के दशहरा ग्राउंड में पहुंचने पर ही मेले का आगाज होगा और भगवान रघुनाथ की रथयात्रा शुरू होगी।

Rajesh Kumar SharmaWed, 13 Oct 2021 09:32 AM (IST)
दशहरा उत्सव में शिरकत करने राज परिवार की दादी माता हिडिम्बा कुल्लू जाने के लिए तैयार हो गई हैं।

मनाली, जागरण संवाददाता। International Kullu Dussehra, दशहरा उत्सव में शिरकत करने राज परिवार की दादी माता हिडिम्बा कुल्लू जाने के लिए तैयार हो गई हैं। माता हिडिम्‍बा के दशहरा ग्राउंड में पहुंचने पर ही मेले का आगाज होगा और भगवान रघुनाथ की रथयात्रा शुरू होगी। मंगलवार को नवरात्र के छठे दिन कारकुनों द्वारा माता हिडिम्बा का रथ सजाया गया। ऋषि मनु व माता हिडिम्बा के भंडार से माता का सज्जो सामान कारकूनों द्वारा देव विधि से मनु मंदिर लाया गया। मंदिर में माता का रथ तैयार किया गया। इस दौरन मनाली गांव के सैकड़ों देवलू माता का आशीर्वाद लेने मंदिर पहुंचे। माता के गूर, पुजारी व कारदार ने देव विधि अनुसार कार्य कर रथ को देर शाम माता हिडिम्बा के ढूंगरी दरबार लाया।

दूसरे नवरात्र में कला वीर व छठे नवरात्र में दानी देवता की विधिवत पूजा की गई। कारकूनों व देव प्रतिनिधियों द्वारा जप पाठ व हवन भी किया गया। कारदार रघुवीर नेगी ने बताया वीरवार को माता हिडिम्बा दशहरे में भाग लेने के लिए कुल्लू रवाना होंगी। भगवान रघुनाथ जी की छड़ी माता हिडिम्बा को लेने के लिए रामशिला नामक स्थान पर लाई जाएगी। रामशिला से  शुक्रवार को माता भगवान रघुनाथ के मंदिर से प्रस्थान करेंगी।

कुल्लू में दशहरा उत्सव सात दिन तक मनाया जाएगा। पूरे भारत में दशहरे का समापन होगा और कुल्लू में दशमी के दिन इसका विधिवत आगाज होगा। भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा निकाली जाएगी, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु भाग लेंगे।

माता हिडिम्बा का कुल्लू दशहरे में रहता में विशेष महत्व

माता हिडिम्बा की दशहरे में अहम भूमिका रहती है। माता को राजघराने की दादी कहा जाता है। कुल्लू दशहरा देवी हिडिम्बा के आगमन से शुरू होता है। पहले दिन देवी हिडिम्बा का रथ कुल्लू के राजमहल में प्रवेश करता है और यहां माता की पूजा के बाद रघुनाथ भगवान को भी ढालपुर में लाया जाता है। माता अगले सात दिन तक अपने अस्थायी शिविर में ही रहती हैं और लंका दहन के बाद ही अपने देवालय लौटती है।

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