वर्तमान संकट के दौर में अनेक ऐसे लोग भी सामने आ रहे हैं जो हर प्रकार से जरूरतमंदों की कर रहे मदद

मनोबल को बनाएं रखेंगे तो स्थिति के साथ जूझ पाएंगे।

Coronavirus in Himachal कौन भूल सकता है ऊना के डाकपाल रामतीर्थ शर्मा को जिन्होंने उन पेंशनधारकों की पेंशन भी डाक विभाग के कर्मचारियों की सहायता से घर तक पहुंचाई थी जिनके खाते बैंकों में थे और बैंक बंद थे।

Sanjay PokhriyalFri, 23 Apr 2021 03:49 PM (IST)

कांगड़ा, नवनीत शर्मा। पंजाबी कहानीकार जसवंत सिंह विरदी की एक कहानी है, धरती के नीचे का बैल। जितना याद रहा, उसके मुताबिक एक बैल है जिसने धरती का बोझ अपने एक सींग पर उठा रखा है। जब वह थक जाता है तो इस भार को अपने दूसरे सींग पर उठा लेता है। इन दिनों, देश भर में जब दवाइयां महंगी हो रही हैं, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले फल, जो उत्पादक से तो सस्ते दामों पर चले थे, पर उपभोक्ता तक आते आते दूर हो गए... रेमडेसिविर जैसे टीके ब्लैक में बेचने की सूचनाएं हैं। डॉक्टर ने लिखा है या नहीं लिखा है, इसके बावजूद इसे रामबाण समझा जा रहा है। जब ऑक्सीजन दुर्लभ वस्तु होती जा रही है, कोरोना मरीज के लिए सुविधाओं वाले बिस्तरों की कमी असुरक्षा की भावना दे रही है, कुछ सींग हैं जिन्होंने धरती का बोझ उठा रखा है। यहां जसवंत सिंह विरदी के प्रति आभार इसलिए व्यक्त करना बनता है, क्योंकि उन्होंने सींगों की परिभाषा बदल दी। कौन हैं ये सींग जो धरती पर रह कर मानवता को मरहम लगा रहे हैं?

ये वे लोग हैं जो सामने दिख रहे संकट में फंसे लोगों की मदद कर रहे हैं। इनके लिए सरकार के हेलीकॉप्टर खरीद को कोसना वक्त की जरूरत नहीं, ये अपना काम कर रहे हैं। ये प्रथम और द्वितीय श्रेणी अधिकारियों के दो दिन के वेतन को कोविड फंड के लिए काटने पर हो हल्ला नहीं मचा रहे हैं, बल्कि जो उनसे संभव हो रहा है, वे कर रहे हैं। ये असली नायक हैं... वे आपको कोरोना विस्फोट, कोरोना बम, कोरोना का कहर जैसी शब्दावली के साथ डराते नहीं हैं, बल्कि सशंकित और सहमी हुई मानवता के पक्ष में खड़े हो रहे हैं। कोई भोजन की व्यवस्था कर रहा है, कोई दूध पीते बच्चों को छोड़ कर महामारी के साथ भिड़ रहा है। ये वे लोग हैं जो उस मनोबल को उठाने में लगे हैं जो महामारी के झटकों और थपेड़ों से बार-बार गिर रहा है। वही मनोबल जो इंटरनेट मीडिया पर कतिपय वीडियो और चैनलों के बेहद डराने वाले शब्द सुन कर सिहर रहा है। ये वे लोग हैं जो अभी यह नहीं पूछ रहे कि स्वास्थ्य सेवाओं को एक साल में कोरोना के साथ भिड़ने के लायक बनाने में कहां समस्या थी। ये सभी वे लोग हैं जिनके लिए निजी अस्पतालों के क्रूर गणित से अधिक महत्वपूर्ण मदद का समाजशास्त्र है।

हिमाचल प्रदेश के छोटी काशी मंडी में एक गैस उत्पादन करने वाली कंपनी है आरडी गैसेज। उसके प्रबंध निदेशक सुधांशु कपूर ने घोषणा की है कि किसी गरीब की सांस ऑक्सीजन की कमी से न टूटे, इसलिए उन्हें सिलेंडर निशुल्क दिए जाएंगे। कांगड़ा जिले के शाहपुर से युवा भाजपा नेता हैं र्कािणक उपाध्याय। आजकल वह कोरोना संक्रमित परिवारों के लिए भोजन उपलब्ध करवा रहे हैं। उन्होंने घोषणा कर रखी है कि जिसे जरूरत हो, संपर्क करे, उसे आवश्यक मदद मुहैया कराई जाएगी। सुधीर शर्मा कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री हैं। उन्होंने गुरुवार को ही उपायुक्त कांगड़ा को लिखे पत्र में कहा है, ‘मेरा घर कोविड केयर सेंटर के रूप में इस्तेमाल कीजिए। इसमें 50 बिस्तरों की व्यवस्था हो सकती है।’

इतना ही नहीं, उन्होंने और सुविधाएं देने प्रस्ताव भी दिया है। हालांकि उपायुक्त कांगड़ा राकेश प्रजापति का कहना है कि अभी कांगड़ा में बिस्तरों और अस्पतालों की कमी नहीं है। भविष्य में आवश्यकता होगी तो वह अवश्य बात करेंगे। वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के वयोवृद्ध नेता शांता कुमार ने एक लाख रुपये गुरुवार को कोरोना राहत कोष के लिए दिए हैं। इसी तरह कोरोना की पहली लहर में एक मनरेगा कार्यकर्ता विद्या देवी नायिका बन कर उभरी थीं जिन्होंने पालमपुर के एसडीएम को अपनी कमाई पांच हजार रुपये राहत के लिए सौंपी थी। विद्या देवी की कहानी हाल में रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गए हिमाचल प्रदेश के कतिपय अधिकारियों को बार-बार याद करनी चाहिए। इसलिए कि नियति का नीयत के साथ संबंध होता ही है, केवल संसाधन संपन्न होने से कुछ नहीं होता।

कौन भूल सकता है ऊना के डाकपाल रामतीर्थ शर्मा को, जिन्होंने उन पेंशनधारकों की पेंशन भी डाक विभाग के कर्मचारियों की सहायता से घर तक पहुंचाई थी जिनके खाते बैंकों में थे और बैंक बंद थे। ये सींग अगर बोझ को न बांटें तो भी धरती रहेगी मगर उसे सकारात्मकता का स्पर्श नहीं मिलेगा। सकारात्मक पक्ष यह है कि हिमाचल प्रदेश में अगर बुधवार तक 81,000 लोग संक्रमित हुए हैं तो यह भी सच है कि 69,000 के करीब लोग स्वस्थ भी हुए हैं। राज्य के लिए एक बड़ी उपलब्धि का विषय यह भी है कि वैक्सीन बर्बाद होने की दर हिमाचल प्रदेश में एक फीसद से भी कम है। अब तक करीब 14 लाख लोग वैक्सीन ले चुके हैं। इतने बड़े संकट के दौर में जब कई चेहरे बिछुड़ रहे हैं, कुछ भी छिन सकता है, लेकिन मनोबल नाम की संपत्ति नितांत व्यक्तिगत और अमूल्य होती है। इसलिए मनोबल को बनाएं रखेंगे तो स्थिति के साथ जूझ पाएंगे।

[राज्य संपादक, हिमाचल प्रदेश]

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