कितनी जुबानें और एक गायक, कोई अभागा ही होगा, जिसे एसपी के मखमली सुरों ने स्पर्श न किया

कितनी जुबानों के बीच एक गायक जो कई दिलों पर राज करता रहा, एसपी बालासुब्रमण्यम। फाइल फोटो
Publish Date:Sun, 27 Sep 2020 11:38 AM (IST) Author: Rajesh Sharma

नवनीत शर्मा, धर्मशाला। एक आवाज चली गई...! रोने, सिसकने, बिलखने, चहकने, महकने और हंसने की आवाज! कोई अभागा ही होगा, जिसे एसपी के मखमली सुरों ने स्पर्श न किया हो। एसपी हमारी घायल रूहों पर राहत का फाहा थे। वह उदासी भी लाते भी थे और कई बार उदासी को परत दर परत ऐसा उघाड़ते कि कहकहों और ठहाकों के खरगोश छलांगें मारने लगते थे। हिंदी गानों से प्रेरित होकर गायन में आने वाले एसपी इस विचार को और पुख्ता करने वालों में से थे कि हिंदी को प्रचारित-प्रसारित करने वालों में अकादमिक लोगों से अधिक योगदान कलाकारों का है। हिंदी ही नहीं, उन्होंने तेलुगु, तमिल, कन्नड़ समेत 16 भाषाओं को संगीत में जिया। भले ही यह कहा जाता है कि उन्होंने 40,000 गीत गाए थे लेकिन उन्होंने ही कहा था, 'कितने गाने गाए, यह गिनती अब मैंने छोड़ दी है।' इतनी भाषाओं के भावों को जीने वाला आम इन्सान हो ही नहीं सकता। वे भाव पुरस्कारों और सम्मानों में भी अनूदित हुए। छह बार राष्ट्रीय पुरस्कार और पद्म भूषण तक का सफर सामान्य सफर नहीं हो सकता।

देश के दक्षिण की इस आवाज में जो भजन तत्व था, उससे उत्तर, पश्चिम और पूर्व भी भीग जाते थे। उस आवाज में जो सोज था, वह कंप्यूटर से 'करेक्ट' की जा रही आवाजों में मिल ही नहीं सकता।

कौन भूल सकता है झकझोर कर रख देने के लिए जाने जाते शिवरंजनी राग में यह गीत, 'तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अन्जाना।' लक्ष्मीकांत-प्यारे लाल के संगीत से सजे आनंद बख्शी के इस गीत का एक बोल कितना कालजयी है, ' कितनी जुबानें बोलें लोग हमजोली.... दुनिया में प्यार की एक है बोली!' एसपी बालासुब्रमण्यम साहब की वही बोली थी। यह बोली हर किसी को उपलब्ध नहीं होती। एसपी, दक्षिण के तमाम सितारों के साथ ही हिंदी फिल्मों में कमल हासन से लेकर सलमान खान तक की ऐसी आवाज बने कि अब तक उनकी आवाज सुरक्षित थी, जैसे ईश्वर अपनी किसी वस्तु की हिफाजत करता है। वरना भारतीय उपमहाद्वीप में कई नामी गायक हैं जिनकी आवाज जा चुकी है।

उनके आदर्श रहे मोहम्मद रफी। एसपी बालासुब्रमण्यम ने सोनू निगम को एक मंच पर बताया था,' इंजीनियरिंग के दौरान साइकिल से कॉलेज जाया करता था। रोज रफी साहब का गीत सुनता था... दीवाना हुआ बादल/ सावन की घटा छाई/ ये देख के दिल झूमा/ ली प्यार ने अंगड़ाई/ दीवाना हुआ बादल...!' इसके बाद एसपी ने मुखड़े को गाकर बताया कि कैसे रफी साहब की गायकी एक दृश्य पैदा कर देती है। खासतौर पर शब्द 'झूमा' की अदायगी ऐसी है कि कोई भी अपना दिल हार बैठे। ठीक यही खूबी एसपी की आवाज में भी आई। मंद्र सप्तक से लेकर तार सप्तक तक ऐसा विस्तार कि उसमें सकल सृष्टि दिख जाए। किसी भी साधारण गाने की सबसे बड़ी खूबी यही हो जाती है उसे एसपी बालासुब्रमण्यम ने गाया है। बिना शास्त्रीय संगीत सीखे चल पड़े थे इस राह पर। यह प्रतिबद्धता ऐसा बदलाव लाई कि 1960 तक एक सरकारी इंजीनियर बन कर ढाई सौ रुपये वेतन, जीप और चालक का सपना देखने वाले एसपी बाद में करोड़ों दिलों की धड़कन बन गए।

उन्होंने जितने हिंदी गाने कमल हासन से लेकर आधुनिक सितारों के लिए गाए, उन सबमें उनकी आवाज एक दृश्य बनाती है। हर तरह के रस से सजे उन दृश्यों को देखा, जिया, भोगा और महसूस किया जा सकता है।

लेकिन... यही तो जीवन का मंच है। गाते हुए अभी कितने ही बोल और बनने थे, लेकिन क्या करें, सम का समय आ गया। यह कोरोना के कारण आया है, अन्यथा एसपी साहब जैसा कलाकार अनगिन स्थाई या अंतरों को कभी ऐसे छोड़ कर जाता?

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