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कोरोना से जीत गई पर अफवाहों ने डराया, 63 वर्षीय महिला बोलीं- कैसे इन्सान हैं डॉक्टरों पर थूकने वाले

धर्मशाला, नवनीत शर्मा। ‘कल ही अस्पताल से लौटी हूं। ईश्वर की कृपा तो रही ही लेकिन मैं उन डॉक्टरों, नर्सो और अन्य स्टाफ की आभारी हूं जिन्होंने इतनी सेवा की कि मैं मरते दम तक भूल नहीं पाऊंगी। सब के सब खड़े हैं, नींद भूल कर, अपनों को भूल कर। हमेशा मुझमें सकारात्मकता भरते हुए.. आप ठीक हो जाएंगी। और मैं ठीक हो गई। सोचती हूं कितना अंतर होता है इन्सान और इन्सान में। एक तरफ ये लोग हैं और दूसरी ओर वे लोग जिन्होंने मेरे और मेरे परिवार के बारे क्या-क्या नहीं लिखा। ये ट्रोलिंग थी, इतनी खतरनाक कि मैं कोरोना के खौफ से तो उबर गई, अफवाहों और चर्चाओं के सदमे से नहीं उबरी।

यह कहना है हिमाचल प्रदेश की 63 वर्षीय महिला का जिन्होंने कोरोना पर विजय पाई है और डॉ. राजेंद्र प्रसाद राजकीय मेडिकल कॉलेज टांडा (कांगड़ा) से अपने घर पहुंची हैं। प्रदेश की वह दूसरी कोरोना विजेता हैं। उनके अनुरोध पर नाम और चित्र नहीं दिए जा रहे हैं। वैसे भी संदेश अधिक महत्वपूर्ण है। ‘आवाज में थकावट थी, दृढ़ता की कमी नहीं थी। एक अनुभवजन्य ठहराव भी था। लेकिन मीडिया और सोशल मीडिया की चर्चा आते ही उनमें न थकावट रहती है और ठहराव। कड़ी आवाज में कहती हैं, ‘बेटे के पास गई थी दुबई। लौट कर आई तो स्वयं ही डॉक्टर को भी दिखाया। सारे कागजात और सामान तक जांचा जाता है। मुङो मलाल है कि मुङो ऐसे नागरिक के तौर पर सोशल मीडिया और मीडिया के एक वर्ग में पेश किया गया जो देश के नियम से ऊपर हो। अपराधी बना दिया मुङो। मुङो अंदर सब पता चलता था। मैं यही कहती थी, ‘रोग से डरो, रोगी से नहीं।’ 

‘दवा आदि चल रही हैं अब भी? इस पर कहती हैं, ‘जो डॉक्टरों ने बताया है वह सब कर रही हूं। डॉक्टरों ने इतने भाव से बातचीत की कि उनका कहा कभी नहीं टाल सकती। हैरानी इस बात की है कि कैसे लोग होंगे जो इन भगवानों पर थूकते हैं। समझ में नहीं आता कैसे इन्सान हैं।’

अपना मनोबल कैसे बनाए रखा

इसका जवाब था, ‘मुझमें मनोबल की कोई कमी नहीं है लेकिन एक दिन अफवाहबाजों ने यह बात फैला दी कि कोरोना पॉजिटिव महिला की मृत्यु हो गई। उस दिन मेरे बच्चे भी रोए.. पति भी। खबरें ये थी कि अब मेरे घर वाले भी मुङो नहीं देख पाएंगे। सोचिए कुछ फेसबुकियों और चर्चाबाजों के कारण मेरे परिवार ने क्या नहीं ङोला। कुछ दिन बाद तब्लीगी आ गए। तब्लीगियों के आने के बाद मैंने तीन रातें अस्पताल में काटीं पर भय के माहौल में। भला हो डॉक्टरों और नसोर्ं का। उनके सहारे वक्त कट गया।’

आपको भरोसा था कि आप ठीक हो जाएंगी

‘इसके जवाब में वह कहती हैं, ‘हां, मुझे अपनी दिनचर्या और अब तक के जीवन में जो कुछ किया है, उस सब पर भरोसा था। आप जानते हैं कि मेरे साथ ही 32 साल का युवक भी दाखिल था। हम दोनों पॉजिटिव थे। सुखद संयोग है कि वह कुछ दिन पहले ठीक हो गया। मैं खाना नहीं खाती थी मुङो नर्स कहती थी, आंटी अंडे खा लिया करो। कुछ खाएंगी नहीं तो ठीक कैसे होंगी। पर मैंने उनके कहने पर खाना तो खाया, अंडे नहीं खाए। जीवनभर शाकाहारी रही हूं, इस उम्र में कोरोना के डर से अंडे खाऊं, यह नहीं होगा।

अंत में वह कहती हैं, ‘सावधान रहें, सतर्क रहें, नियमों का और दिनचर्या का पालन करें।’ (दैनिक जागरण इनके दीर्घायु होने की कामना करता है।)

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