चैत्र नवरात्र में बज्रेश्‍वरी देवी मंदिर में उमड़ते हैं श्रद्धालु, नौ देवियों में तीसरे स्‍थान पर होती है पूजा, जानिए मान्‍यता

मां बज्रेश्वरी का मंदिर जिला कांगड़ा में स्थित है।

Bajreshwari Devi Temple मां बज्रेश्वरी का मंदिर जिला कांगड़ा में स्थित है। मंदिर के गर्भ गृह में मां पिंडी रूप में दुर्गा के स्वरूप में विराजमान हैं। मां बज्रेश्वरी देवी के मंदिर को नगरकोट धाम व कांगड़ा देवी के नाम से भी जाना जाता है।

Rajesh Kumar SharmaMon, 12 Apr 2021 10:03 AM (IST)

कांगड़ा, बिमल बस्सी। Bajreshwari Devi Temple, मां शक्ति के कई स्वरूप हैं। कई मंदिर हैं, जो आज श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बने हुए हैं। सभी जानते हैं कि हिमाचल एक देव भूमि है और देव भूमि इसलिए है क्योंकि यहां पर कई देवस्थल हैं, जिनकी अपनी मान्यता व इतिहास है। इन्हीं शक्तिपीठों में से एक है, मां बज्रेश्वरी का मंदिर। यह मंदिर जिला कांगड़ा में स्थित है। मंदिर के गर्भ गृह में मां पिंडी रूप में दुर्गा के स्वरूप में विराजमान हैं। मां बज्रेश्वरी देवी के मंदिर को नगरकोट धाम व कांगड़ा देवी के नाम से भी जाना जाता है। माता श्री ब्रजेश्वरी देवी के भव्य मंदिर के सुनहरे कलश के दर्शन दूर से ही होते हैं।

नौ देवियों की यात्रा में मां बज्रेश्वरी तीसरे स्थान पर हैं

प्रसिद्ध नौ देवी यात्राओं में मां बज्रेश्वरी के दर्शन तीसरे स्थान पर हैं। यूं तो सारा वर्ष यहां भक्त दर्शनों के लिये आते हैं। लेकिन चैत्र, श्रावण तथा शारदीय नवरात्रि पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। यहां तक पुहंचना बिल्कुल सरल है। मंदिर की दूरी कांगड़ा एयरपोर्ट से 12 किलोमीटर, रेलवे स्टेशन से तीन किलोमीटर तथा कांगड़ा बस अड्डा से मात्र आधा किलोमीटर है।

पौराणिक कथाओं के अनसुार

पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी सती के पिता दक्षेश्वर द्वारा किए यज्ञ में उन्हें न बुलाने पर उन्होंने अपना और भगवान शिव का अपमान समझा और उसी हवन कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिये थे। तब भगवान शंकर देवी सती के मृत शरीर को लेकर पूरे ब्रह्माण्ड के चक्कर लगा रहे थे। उसी दौरान भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया था और उनके अंग धरती पर जगह-जगह गिरे। जहां उनके शरीर के अंग गिरे, वहां एक शक्तिपीठ बन गया। उसमें से सती की बायां वक्षस्थल इस स्थान पर गिरा था, जिसे मां ब्रजेश्वरी या कांगड़ा माई के नाम से पूजा जाता है।

पांडवों ने करवाया था मां दुर्गा के मंदिर का निर्माण

कहा जाता है महाभारत काल में पांडवों ने मंदिर का निर्माण करवाया था। मां दुर्गा ने पांडवों के स्वपन में आकर नगरकोट नामक स्थान पर मंदिर निर्माण करने को कहा था। वरना उनका समूल नाश हो जाएगा। जिस कारण पांडवों ने मूल मंदिर का निर्माण करवाया था, जो 1905 में हुए भूकंप के दौरान पूरी तरह से ध्वस्त हो गया तथा लगभग 22 वर्षों की मेहनत के बाद माता श्री बज्रेश्वरी देवी मंदिर का पुर्ननिर्माण हुआ जो दुनिया के लिए पूजनीय स्‍थल बना है।

ऐसा है मंदिर

मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार में एक नागरखाना है इसे किले के प्रवेश द्वार की तरह बनाया गया है। मंदिर परिसर भी किले की भांति पत्थरों की दीवारों से घिरा हुआ है। मंदिर के पीछे क्षेत्रपाल भगवान शिव का मन्दिर भी बना हुआ है मंदिर परिसर में भैरव का एक मंदिर तथा ध्यानू भक्त की मूर्ति भी मौजूद है, जिसने अकबर काल में देवी को अपना सिर भेंट किया था। मंदिर की वर्तमान संरचना में तीन गुबंद मुस्लिम, सिख तथा हिन्दू धर्म की आस्था के प्रतीक माने जाते है जो अपने आप में अद्वितीय हैं।

मकर संक्रांति पर घृत पर्व

मंदिर में हर वर्ष जनवरी के दूसरे सप्ताह मकर संक्रांति का त्यौहार बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। किदवंतियों के अनुसार एक युद्ध के दौरान महिषासुर को मारने के पश्चात देवी को काफी चोटें आई थी, उन चोटों से उत्पन्न घावों को ठीक करने के लिए देवी ने नगरकोट में अपने शरीर पर मक्खन का लेप लगाया था। इसी दिन को चिन्हित करने के लिए कांगड़ा के श्री बज्रेश्वरी मंदिर में माता के पिंडी रूप को मक्खन से ढका जाता है। सप्ताह भर चलने वाली इस प्रक्रिया के बाद मक्खन उतार कर श्रद्धालुओं को प्रशाद के रूप वितरित किया जाता है। इस प्रशाद को पाने के लिए देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु कांगड़ा पहुंचते हैं। माना जाता है कि यह मक्खन फोड़े फुंसियों के उपचार में लाभप्रद साबित होता है।

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