सहकारी समितियों के लेखे-जोखे पर सरकार की नजर नहीं

संवाद सहयोगी, बिलासपुर : बिलासपुर जिले में सहकारिता विभाग से संबंद्ध सहकारी समितियों में वित्तीय अनियमितताएं सामने आने के पीछे एक बड़ा कारण इनके लेखे-जोखे पर सरकार की कड़ी नजर न होना भी है। सालाना होने वाले ऑडिट में सहकारी समितियों के खातों की बारीकी से जांच न होने के कारण ही पैसे के गड़बड़झाले सामने आ रहे हैं।

सहकारी समितियों का सालाना ऑडिट करवाने के लिए सेवानिवृत्त अधिकारियों की भी सेवाएं ली जाती हैं। इस व्यवस्था में भी दोष सामने आ रहे हैं। उन सभाओं के लेखों में भारी खामियां दर्ज की जा रही हैं जिनका सेवानिवृत्त अधिकारी ऑडिट कर रहे हैं। अब जब बिलासपुर जिले में कुछ सहकारी सभाओं के पैसे की तथाकथित हेराफेरी का मामला सामने आया तो विभाग ने बेशक अपने नियमित ऑडिटर इन सोसायटियों में भेजे हैं लेकिन आज भी महकमे में ऑडिटरों की तादाद कम होने के कारण काम समय पर नहीं निपटाया जा रहा रहा है। ऑडिट में वे खामियां सामने आ रही हैं जिन्हें रिटायर्ड अधिकारियों ने नजरअंदाज कर दिया था या फिर दबा दिया था।

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पूंजी निवेश करने से पहले जांच-पड़ताल कर लें : रमेश

विभाग के सहायक पंजीयक रमेश शर्मा मानते हैं उनके पास ऑडिटरों की संख्या कम है, इसलिए सेवानिवृत्त अधिकारियों से ऑडिट करवाने की व्यवस्था की गई है। उन्होंने उपभोक्ताओं व सभाओं के सदस्यों से आग्रह किया है कि वे अपनी पूरी पूंजी सभाओं में डिपोजिट न करवाएं। किसी भी सोसायटी की वित्तीय स्थिति के बारे में पहले ही पूरी जांच-पड़ताल कर लें। सोसायटी को हेंडिल करने वाली प्रबंध समीति को लेकर भी क्रॉस चेक कर लें। निवेश जरूर करें लेकिन सोसायटी की बैक ग्राउंड देखकर।

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अनुभवी ऑडिटरों की कमी

सूत्र बताते हैं कि सेवानिवृत्त अधिकारियों को सभाओं की ओर से सालाना कुछ फीस तय की जाती है। लेकिन बदले में जिम्मेदारी तय नहीं होती है। ऐसे में ये अधिकारी सभाओं के तथाकथित कारनामों को दबाने का काम कर रहे हैं। करलोटी सहकारी सभा इसका उदाहरण है। वर्तमान में जिले में विभाग की हालत ऐसी है कि कुल आठ ऑडिटरों के पदों में से चार ही हैं। इनमें से तीन अभी फ्रेश नियुक्ति के हैं जिनके पास सभाओं के ऑडिट का अनुभव नहीं है। सिर्फ एक ही ऑडिटर अनुभवी है। सहायक पंजीकय रमेश शर्मा ने कहा सभाओं के प्रबंधक वर्ग उनके यहां लेन-देन ऑनलाइन नहीं होने का भी नाजायज फायदा उठाते हैं।

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