Parali Pollution: यमुनानगर में पराली जलाने पर सख्ती, ब्लाक व ग्राम स्तर पर कमेटियों का गठन

यमुनानगर में पराली जलाने पर सख्‍ती की गई है। पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए पराली जलाने पर कार्रवाई की जाएगी। साथ ही ब्‍लाक ग्राम स्‍तर पर कमेटियां भी गठित की गई हैं। कमेटियां अपने क्षेत्र में नजर रखेंगी।

Anurag ShuklaSat, 18 Sep 2021 04:58 PM (IST)
पराली न जलाने के लिए कमेटियां गठित।

यमुनानगर, जागरण संवाददाता। बिगड़ते पर्यावरण संतुलन को देखते हुए पराली जलाने के मामलों पर पूर्ण रूप से अंकुश लगाने की तैयारी है। प्रशासन की ओर से इस दिशा में कमेटियों का गठन किया गया है। ये कमेटियां अपने-अपने कार्यक्षेत्र में पूरी तरह नजर बनाए रखेंगी। पराली जलाने का मामला सामने आते ही तुरंत कार्रवाई की जाएगी। सब डिवीजन, ब्लाक व ग्राम स्तरीय कमेटियों का गठन कर दिया गया है। एसडीएम जगाधरी, रादौर व बिलासपुर नोडल आफिसर होंगे। खंड स्तर पर गठित कमेटी में बीडीपीओ, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, खंड कृषि अधिकारी व संबंधित थाना प्रभारी होंगे। इसी तरह ग्राम स्तरीय कमेटी में कृषि विकास अधिकारी, पटवारी व पंचायत सचिव को शामिल किया गया है।

किसानों को जागरूक करेंगे कमेटियां

पराली जलाने वालों पर कार्रवाई के साथ-साथ जागरूकता अभियान भी चलाए जाएंगे। कमेटी के सदस्य किसानों को विभिन्न माध्यमों से जागरूक करेंगे। किसान गोष्ठियों का का आयोजन कर पराली जलाने के खतरों से अवगत कराया जाएगा। किसानों को बताया जाएगा कि किस तरह पराली का प्रबंधन किया जा सकता है। पराली का प्रबंधन कर किसान किस तरह उर्वरा शक्ति को बढ़ा सकते हैं। इसके विकल्प क्या हैं और इन विकल्पों को किसान किस तरह प्रयोग कर सकता है। फसल की कटाई के दौरान कमेटी अपने-अपने क्षेत्र में नजर रखेंगे।

जैविक खाद की होती आपूर्ति

विशेषज्ञों के मुताबिक फसल अवशेषों के साथ 10-15 किलोग्राम यूरिया खाद डालने से अच्छी जैविक खाद मिलती है। भूमि की उर्वरा शक्ति व जैविक कार्बन में बढ़ौतरी होती है। इससे समय की बचत होती है और उपयुक्त समय पर बिजाई संभव होती है। फसल अवशेष पोटाश व अन्य पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने का महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं। इससे रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है। इस प्रकार विदेशी मुद्रा बचती है। पानी की बचत होती है। फसल अवशेष अत्याधिक गर्मी व ठंड में भूमि के तापमान नियंत्रण में सहायक होते है। बदलते मौसम के प्रभाव का प्रकोप कम होता है। फसलों की उपज में दो से लेकर चार क्विंटल प्रति हैक्टेयर की बढ़ोतरी होती है।

फसली अवशेषों को न जलाएं बल्कि इनका सदुपयोग कर भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाएं। फसल अवशेषों को जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। आगजनी की घटनाओं को रोकने में सभी जिलावासी अपना पूरा सहयोग दें। इस दिशा में निगरानी रखने के लिए कमेटी का भी गठन किया जा चुका है। हमारा प्रयास है कि जिले में पराली जलने का एक भी केस न आए।

जसविंद्र सैनी, उप निदेशक, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग।

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