दिल हारा तो पैरों ने दिया सहारा, फिर उम्र की बेडिय़ा तोड़ बन गए चैंपियन

पानीपत [विजय गाहल्याण]। सपने इंसान की जिंदगी का वो सच हैं जो अगर हकीकत की कसौटी पर खरे उतर जाएं तो उसे खुशियों की बहारों से सराबोर कर देते हैं। हालांकि, सपनों और हकीकत के बीच सफर में आने वाली चुनौतियां इंसान के हौसलों का असली इम्तिहान लेती हैं। 

65 साल के अंतरराष्ट्रीय एथलीट बलवान सिंह घणघस को भी एक ऐसे ही इम्तिहान से गुजरना पड़ा। दरअसल, दो साल पहले उन्हें हृदयाघात हुआ। डॉक्टरों ने खेलने से मना कर दिया। कहा, जीना है तो आराम जरूरी है। पत्नी दयावंती के साथ परिवार के अन्य सदस्य भी उनकी उछलकूद के खिलाफ हो गए। अब उनके सामने अपने सपने और स्वास्थ्य के बीच में किसी एक को चुनने की चुनौती थी। यहां उन्होंने सिर्फ अपने हारे हुए दिल की सुनी और सपने को प्राथमिकता दी। नतीजा यह है कि जिस उम्र में लोग सपने देखना छोड़ देते हैं, उसमें बलवान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर रहे हैं। 

स्वर्ण पदकों से भरी झोली

बलवान की जिजीविषा की मिसाल उनकी झोली में मौजूद स्वर्ण पदकों की संख्या है। पांच से दस फरवरी को आंध्रप्रदेश के गंटूर में हुई 40वीं मास्टर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में हाईजंप में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता। वे एशिया मास्टर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में चौथे स्थान पर रहे। नेशनल में 12 स्वर्ण, पांच रजत सहित 40 पदक जीत चुके हैं। अब उनका लक्ष्य दिसंबर में मलेशिया में होने वाली एशिया मास्टर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतना है। 

स्टेडियम में सुविधा नहीं मिली तो फार्म हाउस को बनाया खेल का मैदान

को-ऑपरेटिव बैंक से मैनेजर के पद से सेवानिवृत्त बलवान सिंह ने बताया कि कॉलेज में ऊंची कूद लगाते थे। पढ़ाई की वजह से खेल छूट गया। नौकरी मिल गई। हालांकि, दिल के एक कोने में कुछ सपने जिंदा थे। इस बीच, 2008 में पता चला कि 35 साल से ज्यादा आयु वर्ग के लिए भी एथलेटिक्स प्रतियोगिता होती है। जिंदगी के आगे का मकसद मिल चुका था। ऊंची कूद में नाम कमाने के लिए कड़ा अभ्यास शुरू किया। पहले ही साल राज्य में स्वर्ण और राष्ट्रीय मास्टर एथलेटिक्स प्रतियोगिता में रजत पदक जीत लिया। हौसला बढ़ा और खेलने का जुनून भी। अब इस राह में बाधा बनी सुविधाओं की कमी। शिवाजी स्टेडियम में हाईजंप का मैट नहीं था तो नौल्था के अपने फॉर्म हाउस में मैट खरीदकर रखा और यहीं पर अभ्यास किया।

बूढ़ी हड्डियों का देख जुनून, दंग रह गया नया खून

बलवान के बड़े बेटे प्रदीप घणघस भी वालीबॉल और हाईजंप में राज्य स्तर पर चार पदक जीत चुके हैं। प्रदीप पिता को आदर्श मानते हैं। कहते हैं कि उनके जुनून को देखकर मेरा जोश भी हाई रहता है। सभी रिश्तेदार, दोस्त व पड़ोसी बलवान की जीत पर खुश हैं। मां दयावंती भी अब पिता की जीत पर हर्षित हैं। वे अब उन्हें अभ्यास के लिए नहीं टोकती हैं। 

सबसे स्वस्थ एथलीट हैं बलवान 

मास्टर एथलेटिक्स एसोसिएशन के प्रधान राजसिंह आर्य ने कहा कि बलवान सिंह राज्य व राष्ट्रीय एथलेटिक्स प्रतियोगिता में 65 साल की आयु के सबसे स्वस्थ एथलीट हैं। फील्ड में उनकी फुर्ती काबिले तारीफ है। युवा भी उनसे प्रेरणा ले सकते हैं। 

1952 से 2019 तक इन राज्यों के विधानसभा चुनाव की हर जानकारी के लिए क्लिक करें।

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.