पंजाब के नेताओं को पीछे छोड़ किसान संसद में भी चमकने में कामयाब रहे राकेश टिकैत

टिकैत को पंजाब के नेताओं से दिक्कत नहीं उनसे तो वह आंदोलन का नेतृत्व लगभग छीन ही चुके है उनकी समस्या आंदोलन से हुड्डा समर्थकों के मुंह मोड़ लेने से है। लेकिन टिकैत की मजबूरी है कि उन्हें हुड्डा या चौटाला में से एक को चुनना था।

Sanjay PokhriyalSat, 24 Jul 2021 09:48 AM (IST)
टिकैत ने बड़ी कुशलता से पहले दिन किसान संसद में अपने को चर्चा के केंद्र में ला दिया।

जगदीश त्रिपाठी, पानीपत। कृषि कानून विरोधी आंदोलनकारियों की तरफ से दिल्ली में किसान संसद की परिकल्पना आंदोलन से जुड़े पंजाब के नेताओं की रही। दिल्ली में जंतर-मंतर पर पहले और दूसरे दिन अधिकतर लोग भी पंजाब के ही थे। प्रतिदिन दो सौ लोगों के ही कथित किसान संसद में जा रहे हैं, पहले दिन भी इतने ही पहुंचे थे। राकेश टिकैत इस बात को समझ रहे थे कि किसान संसद पहले दिन ही चर्चा का विषय बनेगी। उसके बाद नेपथ्य में चली जाएगी। सो, टिकैत ने बड़ी कुशलता से पहले दिन किसान संसद में अपने को चर्चा के केंद्र में ला दिया। पंजाब से जुड़े नेता नेपथ्य में रहे। दूसरे दिन पंजाब के नेताओं ने सामने आने का प्रयास किया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और टिकैत चर्चा के केंद्र में आकर अपना काम कर चुके थे।

गौरतलब है कि छब्बीस जनवरी को दिल्ली में हुई हिंसा के बाद जब से टिकैत चर्चा में आए हैं, वह चर्चा में बने रहने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। बंगाल के चुनावों को ही लें। आंदोलन के कई नेता वहां भाजपा के विरोध में प्रचार करने पहुंचे थे, लेकिन पूरे देश में छपे-दिखाए गए-छाए रहे केवल टिकैत। चुनाव के बाद बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मिले तो केवल टिकैत। ऐसा नहीं कि पंजाब के नेता टिकैत की रणनीति समझते नहीं हैं, लेकिन टिकैत मौका मिलते ही चौका लगा देते हैं।

पंजाब के नेता यह समझते हैं कि टिकैत की राजनीतिक महत्कांक्षाएं हैं, इसलिए पंजाब के नेता बार बार किसी राजनीतिक व्यक्ति को आंदोलन का मंच साझा करने की इजाजत नहीं देते। लेकिन टिकैत को इससे फर्क नहीं पड़ता। वह रास्ता निकाल लेते हैं। इंडियन नेशनल लोकदल के प्रमुख ओमप्रकाश चौटाला जब टिकैत के प्रभाव वाले उत्तर प्रदेश-दिल्ली की सीमा पर स्थित गाजीपर में स्थित आंदोलनस्थल पर पहुंचे तो टिकैत ने खुद उनका स्वागत किया। सहारा देकर अपने साथ बैठाया। अब भले ही चौटाला मंच पर नहीं गए लेकिन टिकैत को चौटाला को सम्मान देना था और उन्होंने दिया।

इधर, आंदोलन को चुनावी राजनीति से दूर रहने की बात पंजाब के नेता कह रहे हैं और उधर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तीन चार जिलों में प्रभावी उनकी यूनियन भारतीय किसान यूनियन ( टिकैत) ने उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में अपने प्रत्याशी उतारने की घोषणा कर दी। यद्यपि पंजाब के नेताओं के आग्रह के बाद राकेश टिकैत ने बयान को वापस लेने की बात कही और साथ में जोड़ दिया कि ऐसी कोई योजना नहीं है। लेकिन चुनाव होंगे और टिकैत की यूनियन उसमें हिस्सा लेगी तो पंजाब के नेता टिकैत का बिगाड़ क्या लेंगे? वैसे भी आंदोलन अब केवल हरियाणा में ही थोड़ा बहुत प्रभावी रह गया है।

भले ही आंदोलन के नेता यह लाख कहें कि हमारा राजनीति से कोई मतलब नहीं, लेकिन अब उनका बचाखुचा आंदोलन हरियाणा के दो राजनीतिक दलों कांग्रेस और इनेलो के समर्थन से ही चल रहा है। ओमप्रकाश चौटाला के सक्रिय हो जाने के बाद आंदोलन का केंद्र उनका गृह जिला सिरसा बन गया है। दूसरी तरफ कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा के समर्थक चौटाला की एंट्री के बाद आंदोलन से दूरी बनाने लगे हैं। सो, टिकैत को पंजाब के नेताओं से दिक्कत नहीं, उनसे तो वह आंदोलन का नेतृत्व लगभग छीन ही चुके है, उनकी समस्या आंदोलन से हुड्डा समर्थकों के मुंह मोड़ लेने से है। लेकिन टिकैत की मजबूरी है कि उन्हें हुड्डा या चौटाला में से एक को चुनना था और चौटाला उनकी स्वाभाविक पसंद थे, इसलिए उन्होंने चौटाला को चुना। चौटाला को चुनने के बाद हुड्डा समर्थक टिकैत के विरोध में भी आ गए हैं। इंटरनेट मीडिया पर तो वे अति मुखर हैं।

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