Navratri 2021: कुरुक्षेत्र में आए हैं तो भद्रकाली के दर्शन जरूरी, अपने आप खींचे आते हैं श्रद्धालु, ये है मान्‍यता

कुरुक्षेत्र ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी के लिए प्रसिद्ध है। अगर आप यहां पर आते हैं तो मां भद्रकाली के दर्शन जरूर करिए। यहां पर श्रद्धालु अपने आप खींचे चले आते हैं। हरियाणा में एकमात्र श्रीदेवी कूप भद्रकाली शक्तिपीठ है।

Anurag ShuklaThu, 14 Oct 2021 07:07 PM (IST)
कुरुक्षेत्र स्थित श्रीदेवी कूप मां भद्रकाली शक्तिपीठ।

कुरुक्षेत्र, जागरण संवाददाता। कुरुक्षेत्र का नाम आते ही सबके सामने महाभारत के चित्र चलने लग जाते हैं। यही वह धरती हैं जहां श्रीकृष्ण के अर्जुन को कर्म का संदेश दिया। यहीं पर श्रीदेवी कूप भद्रकाली शक्तिपीठ है। नवरात्र में देवीकूप की पूजा का विशेष महत्व है। सामान्य दिनों में भी यहां भक्तों की कतार लगी रहती हैं। पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, प्रणब मुखर्जी सहित कई बड़ी हस्ती शीश नवा चुके हैं।

आपको देवीकूप भद्रकाली मंदिर के साथ कुरुक्षेत्र के बारे में भी बताते हैं

कुरुक्षेत्र 48 कोस में फैला एक विशाल क्षेत्र है। जिसमें ब्रह्मसरोवर समेत कई तीर्थ स्थान, मंदिर और पवित्र तालाब शामिल हैं। जिनके साथ पांडवों और कौरवों और महाभारत युद्ध से जुड़े कई घटनाओं व अनुष्ठानों का संबंध रहा है। कुरुक्षेत्र आर्य सभ्यता और पवित्र सरस्वती के उदय के साथ इसके विकास से निकटता से संबंधित है। इस भूमि पर ऋषि मनु ने मनुस्मृति लिखी थी। हालांकि कुरुक्षेत्र के नाम से अपना कुछ नहीं है। न कोई शहर और न ही कोई कस्बा इसके नाम से बसा है। बस इसके नाम से ही सबकी पहचान है। कुरुक्षेत्र का जिला मुख्यालय थानेसर है। इस नाम से अपनी पहचान बनाए है। करनाल और कैथल जिलों के साथ कुरुक्षेत्र को देश के धान का कटोरा के रूप में भी जाना जाता है।

ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व भी

कुरुक्षेत्र का वर्णन श्रीमद भागवत के पहले श्लोक में धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र के रूप में किया गया है। कुरुक्षेत्र एक महान ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का स्थान है। जिसे वेदों और वैदिक संस्कृति के साथ जुड़े होने के कारण सभी देशों में श्रद्धा के साथ देखा जाता है। इस भूमि पर महाभारत की लड़ाई लड़ी गई थी और भगवान कृष्ण ने ज्योतिसर में अर्जुन को कर्म के दर्शन का उचित ज्ञान दिया था।

राजा कुरु के नाम पर पड़ा कुरुक्षेत्र

कुरुक्षेत्र का नाम राजा कुरु के नाम पर रखा गया था। जिससे इस भूमि और इसके लोगों की समृद्धि के लिए महान बलिदान हुए। कुरुक्षेत्र भारत के इतिहास जितना पुराना है। जिस क्षेत्र में कुरुक्षेत्र जिला है, उस क्षेत्र का इतिहास प्राचीन आर्यन अतीत के समय कभी-कभी मंद होता है। इतिहासकारों का मानना है कि यह भारत में आर्यों के आव्रजन से पहले भी एक धार्मिक केंद्र था।

गठन से पहले करनाल का हिस्सा था कुरुक्षेत्र

कुरुक्षेत्र का हिस्सा बनने वाला क्षेत्र राज्य गठन के समय करनाल जिले का हिस्सा था। यह मुख्य दिल्ली अंबाला रेलवे लाइन पर है। दिल्ली से लगभग 160 किलोमीटर उत्तर, करनाल से 34 किलोमीटर और अंबाला से 40 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। कुरुक्षेत्र एक ऐसी जगह है जो पूरे भारत में अपनी महान सांस्कृतिक विरासत के लिए जानी जाती है। मार्कण्डा और सरस्वती प्रमुख नदियां हैं। मनु के अनुसार कुरुक्षेत्र में पुरानी पवित्र नदियों सरस्वती और दृश्यद्वती के बीच के मार्ग को ब्रह्मवर्त के रूप में जाना जाता था।

ऐसे पहुंचे कुरुक्षेत्र

कुरुक्षेत्र दिल्ली-अंबाला रेलवे लाइन पर स्थित है। दिल्ली से लगभग 160 किलोमीटर उत्तर, करनाल से 34 किलोमीटर और अंबाला से 40 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। अगर बस या अपनी गाड़ी से आते हैं तो आप राष्ट्रीय राजमार्ग-44 से होकर दिल्ली या चंडीगढ़ से आ सकते हैं। कुरुक्षेत्र का करीबी हवाई अड्डा चंडीगढ़ है। यहा से आप बस टैक्सी लेकर आसानी से कुरुक्षेत्र आ सकते हैं। जीटी रोड पर पिपली से आपको पश्चिम दिशा में चलना होगा। इससे आगे आप तीर्थों का भ्रमण कर सकते हैं।

यह देवीकूप का इतिहास

हरियाणा का एकमात्र शक्तिपीठ श्रीदेवीकूप मां भद्रकाली मंदिर नवरात्रोत्सव के लिए तैयार हो जाता है। कोरोना से राहत के बाद इस बार मंदिर में लाखों लोग पूजा करने पहुंचे हैं। नवमी के दिन भी मंदिर में पूरा दिन दर्शनों के लिए कतार लगी रही। पीठाध्यक्ष सतपाल महाराज ने कहा कि मंदिर के 108 फुट ऊंचे गुंबद को रंग बिरंगी रोशनियों से सजाया गया था। वामन पुराण व ब्रह्मपुराण में कुरुक्षेत्र के सदंर्भ में चार कूपों का वर्णन आता है। जिसमें चंद्र कूप, विष्णु कूप, रुद्र कूप व देवी कूप है। श्रीदेवी कूप भद्रकाली शक्तिपीठ का इतिहास दक्षकुमारी सती से जुड़ा हुआ है।

शिव पुराण के अनुसार एक बार सती के पिता दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया था। यज्ञ में सती व उसके पति शिव के अतिरिक्त सभी देवी-देवताओं व ऋषि-मुनियों को बुलाया गया। जब सती को इस बात का पता चला तो वह अनुचरों के साथ पिता के घर पहुंची। वहां भी दक्ष ने उनका किसी प्रकार से आदर नहीं किया और क्रोध में आकर शिव की निंदा करने लगे। सती अपने पति का अपमान सहन न कर पाई और हवन कुंड में सम्माहित हो गई। भगवान शिव जब सती की मृत देह को लेकर ब्राह्मांड में घूमने लगे तो भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 52 हिस्सों में बांट दिया। जहां-जहां सती के अंग गिरे वहां-वहां पर शक्तिपीठ स्थापित हुए। बताया जाता है कि यहां मां का दायां गुल्फ गिरा था। हर नवरात्र उत्सव में यहां पर लाखों श्रद्धालु पहुंचकर मां के समक्ष नतमस्तक होते हैं और मनोकामना मांगते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर कूप पर मिट्टी, चांदी और सोने के घोड़े चढ़ाने की परंपरा है। हिंदू ग्रंथों में ऐसे केवल 52 शक्तिपीठों का वर्णन मिलता है। श्रीकृष्ण भगवान ने भी पांडवों के हाथ यहां घोड़े चढ़ाए थे।

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