Dussehra 2021: दशहरे पर पाकिस्‍तान के हिंदुओं ने शुरू की थी ये पंरपरा, आज भी हरियाणा के कैथल में निभा रहे

दशहरा पर्व पर पाकिस्तान के हिंदुओं की परंपरा को आज भी कैथल में लोग निभा रहे हैं। भगवान हनुमान के स्वरूपों का पूजन किया जाता। पाकिस्तान में लईया समाज द्वारा भगवान हनुमान के स्वरूपों की पूजा की शुरुआत की गई थी।

Anurag ShuklaFri, 15 Oct 2021 08:58 AM (IST)
कैथल में दशहरा पर्व पर निकले हनुमान स्‍वरूप।

कैथल, जागरण संवाददाता। दशहरा पर्व पर भगवान हनुमान के स्वरूपों के पूजन की पाकिस्तान के हिंदुओं की परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है। इस पर्व पर भगवान हनुमान स्‍वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। कैथल में करीब 50 वर्ष पहले इस परंपरा को शुरू किया गया था। शहर में प्रताप गेट स्थित श्री हनुमान सेवा समिति सबसे अधिक पुरानी है। इस समिति की शुरुआत बिल्ला भगत द्वारा की गई थी।

वर्तमान में कुल 11 समितियों द्वारा भगवान हनुमान के चलिया व्रत के नियम का पालन किया जा रहा है। दशहरा पर्व पर इन समितियों के सदस्यों द्वारा हनुमान के स्वरूप धारण कर घरों में परिक्रमा कर आशीर्वाद भी दिया जाता है। कोरोना महामारी के कारण इन कार्यक्रमों का आयोजन सीमित ही किया जा रहा है। समितियों के सदस्य शहर में दंडवत करते हुए शहर की परिक्रमा करते हैं।

यह है समितियों द्वारा स्वरूपों के चलिया का इतिहास

श्री पवन पुत्र हनुमान सेवा समिति के कोषाध्यक्ष प्रिंस वर्मा ने बताया कि आजादी से पहले पाकिस्तान में लईया समाज जो पंजाबी समुदाय से संबंध रखते हैं, उन लोगों द्वारा दशहरा पर्व पर भगवान हनुमान के स्वरूप धारण करने की परंपरा शुरू की गई थी। इस परंपरा का निर्वहन मन्नत पूरी होने पर किया जाता था। जब आजादी के बाद भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो इस समुदाय के लोग भगवान हनुमान के इन स्वरुपों को पानीपत में साथ लेकर आए थे। उसके बाद सबसे पहले पानीपत और फिर बाद में हरियाणा के कैथल व करनाल में यह परंपरा निभाई जाने लगी।

ब्रह्मचर्य का करते हैं पालन

बता दें कि इस यात्रा में समितियों के वह युवा हिस्सा लेते हैं, जो दशहरे से पहले 41 या 21 दिन तक ब्रह्मचर्य धारण कर घर और व्यवसाय त्यागकर व्रत रखते हैं। वह व्रत रखकर एक समय खाना खाते हैं व जमीन पर सोते हैं। श्रद्धालु मन्नत मांगते हैं। शहर में प्रताप गेट, सीवन गेट, डोगरा गेट, महादेव कालोनी स्थित समितियों द्वारा व्रतधारी युवाओं ने हनुमान के मुकुट वाला स्वरुप धारण कर शहर में परिक्रमा करते हैं। समितियों द्वारा रावण के पुतला बनाया जाता है। स्वरुपों द्वारा शहर की परिक्रमा पूरी करने के बाद अंत में स्वरुप रावण के पुतले पर सोटा मारते हैं। जिसके बाद यह प्रक्रिया समाप्त होती है।

यह है परंपरा

बालाजी सेवा समिति के सेवक कमल मक्कड़ ने बताया कि परंपरा के अनुसार हनुमान जी से मन्नतें मांगते हुए युवा 40 दिन का व्रत दशहरा से 40 दिन पहले शुरू करते हैं। इस दौरान पूजा के समय व्रत रखने वाले बच्चे सिर पर हनुमान जी का विशेष स्वरूप रखते हुए उनका रूप ग्रहण करते हैं। वह 40 दिनों तक दिन में एक समय खाना खाते हैं। नंगे पांव रहते हैं और हनुमान जी के दरबार में ही सोते हैं। इस बीच लोग घरों एवं प्रतिष्ठानों में हनुमान जी के स्वरूप को आमंत्रित कर उनकी पूजा करते हैं। दशहरा के दिन शहर की परिक्रमा पूरी करने के बाद ही यह व्रत पूरा होता है।

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