जानिए कैसे पड़ा हरियाणा के इस गांव का नाम रसीना, देव, पितृ, ऋषि ऋण से जुड़े तीर्थ यहां पर

कैथल का रसीना गांव धार्मिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। गांव से कई पौराणिक मान्यताएं जुड़ी है गांव में स्थित बाबा कांशीपुरी की समाधि की काफी मान्यता है। ऐतिहािसक मान्यता है कि बाबा काशीपुरी के आदेश पर ही यह गांव बसाया गया था।

Rajesh KumarWed, 24 Nov 2021 03:00 PM (IST)
कैथल के रसीना गांव में है ऐतिहासिक ऋणमोचन तीर्थ।

कैथल, जागरण संवाददाता। कैथल के खंड पूंडरी के गांव रसीना का नाम किसी साधु या तीर्थ के नाम पर नहीं, बल्कि गांव में सबसे पहले बसने वाले व्यक्ति के नाम पर पड़ा है। गांव में स्थित बाबा कांशीपुरी की समाधि की काफी मान्यता है। ऐतिहािसक मान्यता है कि बाबा काशीपुरी के आदेश पर ही यह गांव बसाया गया था। गांव का इतिहास करीब सात सौ साल पुराना है। ग्रामीण महेंद्र रसीना ने बताया कि गांव में बाबा काशीपुरी की समाधि है, यहां पर भी बड़ी श्रद्धा से पूजा-अर्चना की जाती है।

करीब सात सौ साल पहले बाबा काशीपुरी के पास हाबड़ी के पंडित ने खेड़ी साकरा निवासी रायसिंह के साथ मिलकर गांव में परिवार को लाकर बसने की अनुमति मांगी थी। जिसके बाद इस गांव का नाम रायसिंह के नाम पर ही रसीना पड़ा। गांव बसने के कुछ साल बाद बाबा काशीपुरी पंचतत्व में विलीन हो गए जिनकी समाधि आज भी आस्था का प्रतीक बनी है। गांव में बाबा काशीपुरी की समाधि पर भव्य मंदिर का निर्माण करके मंदिर में बाबा की प्रतिमा को भी स्थापित किया गया है। मान्यता है कि बाबा की समाधि पर दूध चढ़ाने से श्रद्धालु की मनोकामना पूरी होती है।

ऐतिहासिक ऋणमोचन तीर्थ भी है काफी प्रसिद्ध

ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार ऋणमोचन तीर्थ काफी प्रसिद्ध है। प्राचीन ऋणमोचन तीर्थ का उल्लेख पौराणिक साहित्य के तहत वामन पुराण, ब्रह्मा पुराण व मत्स्य पुराण में भी मिलता है। पौराणिक साहित्य में इस तीर्थ को ऋणप्रमोचन तीर्थ के नाम का उल्लेख मिला है। इसका शाब्दिक अर्थ ऋणों से मुक्त करवाने वाला ही माना जाता है। मान्यता है कि यहां पर आकर पूजा-अर्चना करने व स्नान करने से देव ऋण, पितृ ऋण व ऋषि ऋण से मुक्ति मिलती है। तीर्थ पर हर वर्ष जन्माष्टमी पर्व पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। इस दौरान यहां पर दूर-दराज से श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने के लिए पहुंचते हैं। इस ऋणमोचन तीर्थ पर निकली दो प्राचीनकालीन मूर्तियां इस तीर्थ के पौराणिकता का प्रमाण हैं जिन्हें कुरुक्षेत्र संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है।

यह है तीर्थ का इतिहास

ब्रह्मा पुराण में इस तीर्थ से संबंधित कथा है। जिसके अनुसार प्राचीन समय में कक्षीवान नामक राजा के दो पुत्र थे। ज्येष्ठ पुत्र पृथुश्रवा ने विरक्ति के कारण न तो विवाह किया और न ही अग्निपूजन किया। छोटे पुत्र ने भी प्रवृत्ति दोष (बडे़ भाई के अविवाहित रहने पर छोटे भाई के विवाह से उत्पन्न पाप या दुख) के कारण विवाह करना अस्वीकार कर दिया। यह देखकर पितृगणों ने कक्षीवान के उन दोनों पुत्रों को तीन ऋणों (देव ऋण, पितृ ऋण, ऋषि ऋण) से मुक्ति पाने के लिए विवाह करने का परामर्श दिया, लेकिन उन्होंने विवाह करना अस्वीकार कर दिया।

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