Sawan 2021: छोटी काशी का 3 हजार साल पुराना मंदिर, शिवलिंग हटाने के प्रयास में बहने लगी थी रक्‍त धारा

छोटी काशी यानी हरियाणा के कैथल में तीन हजार साल पुराना प्रताप गेट स्थित प्राचीन श्री अंबकेश्वर मंदिर है। इस मंदिर के बारे में मान्‍यता है कि जब मुगलकाल में मंदिर में स्‍थापित शिवलिंग को हटाने का प्रयास किया गया था तो रक्‍तधारा बहने लगी थी।

Anurag ShuklaFri, 30 Jul 2021 10:58 AM (IST)
तीन हजार साल पुराना प्रताप गेट स्थित प्राचीन श्री अंबकेश्वर मंदिर।

कैथल, जागरण संवाददाता। कैथल शहर में एक शिव मंदिर स्थापित है। जहां स्थापित शिवलिंग को मुगलकालीन काल में हटाने का प्रयास किया गया तो यह पर रक्त की धारा बहने लगी। यह सुनने में हैरानी होगी, लेकिन ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा ही है। यह मंदिर प्रताप गेट स्थित प्राचीन श्री अंबकेश्वर मंदिर है। इस मंदिर से जिला और राज्य ही नहीं, बल्कि देशभर के श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी है। मंदिर में स्थापित प्राचीन शिवलिंग का इतिहास महाभारत काल के समय से भी पुराना है। इसका निर्माण करीब तीन हजार साल पहले हुआ था। यहां पर सावन माह में शिव भक्तों का तांता लगता है। जबकि शिवरात्रि पर्व पर भव्य कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।

शिवलिंग पर किया प्रहार तो बही थी रक्तधारा

ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार मंदिर में स्थापित मुख्य शिवलिंग को स्थापित नहीं किया गया, बल्कि वह हजारों वर्ष पहले सीधा पाताल से प्रकट हुआ था। प्राचीन समय में श्रद्धालु यहां केवल शिवलिंग की पूजा करते थे, लेकिन मुगलकाल के समय इस स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया गया। तब के बाद मंदिर में पूजा-अर्चना की जा रही है। मंदिर के महंत प्रेमानंद पुरी ने बताया कि मंदिर में प्रकट हुआ शिवलिंग स्वयंभू है, जो खुद पाताल से प्रकट हुआ था। औरंगजेब और अकबर के काल में कुछ लोगों ने मंदिर में स्थापित शिवलिंग को हटाने के नीयत से इस पर प्रहार किया। पहले हाथियों को लगाकर इसे हटाने का प्रयास किया, लेकिन असफल रहे। उसके बाद जब कोई चारा नहीं बचा तो वहां पहुंचे लोगों में से एक व्यक्ति ने शिवलिंग पर तेजधार हथियार से प्रहार कर दिया। हथियार का प्रहार होते ही शिवलिंग से रक्तधारा बहने लगी, जिसे देखकर इसे तोड़ने के लिए आए लोग भाग गए। इसके बाद मंदिर की श्रद्धा और अधिक बढ़ गई।

दूसरी ऐतिहासिक मान्यता यह भी है कि इसी स्थान पर मोहम्मद गौरी से युद्ध के समय पृथ्वीराज चौहान की सेना ने पड़ाव डाला था और शीलाखेड़ा के राजा ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। पृथ्वी राज चौहान इस मंदिर को बहुत मानते थे। पृथ्वी राज चौहान ने यहां 16 बार मोहम्मद गौरी की सेना को युद्ध में हराया था।

वर्तमान में मंदिर की यह है स्थिति

प्राचीन श्री अंबकेश्वर मंदिर में यहां शीशे के टुकड़ों को जोड़ कर विशेष प्रकार की कलाकृतियां बनाई गई हैं। देवी देवताओं की प्रतिमाएं भी शीशे के रंगीन टुकड़ों से बनी हैं। शनिवार के दिन मंदिर में माता काली का पूजन होता है। इसके अलावा मंदिर में सत्संग हाल और एक लंगर हाल बनाया गया है। नवरात्र और सावन माह में मंदिर में श्रद्धालुओं की भी भीड़ रहती है।

ऐसे पहुंचे मंदिर में

श्री अंबकेश्वर मंदिर शहर के बीचों-बीच स्थित है। इस मंदिर की रेलवे स्टेशन से दूरी महज दो किलोमीटर की है। जबकि बस स्टैंड से दूरी करीब पांच किलोमीटर की है। रेलवे स्टेशन से पहुंचने वाले लोगों को मंदिर में पहुंचने के लिए प्रताप गेट का आटो लेना पड़ेगा। जबकि बस स्टैंड की तरफ से आने वाले लोगों चंदाना गेट जाने वाले आटो में बैठकर इस स्थल पर पहुंचना पड़ेगा।

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