Haryana Politics: पंजाब की सियासत में हुए बड़े बदलाव हरियाणा के दिग्गज कांग्रेसियों के लिए शुभ संकेत नहीं

Haryana Politics अहीरवाल से कैप्टन अजय यादव आधा दर्जन बार विधायक रहे हैं। हुड्डा के सांसद बेटे दीपेंद्र सिंह केंद्र में राहुल और प्रियंका के करीबी हैं। ऐसे में हर कोई मौके और दांव की राजनीति करता दिखाई दे तो इसमें आश्चर्य नहीं होगा।

Sanjay PokhriyalWed, 22 Sep 2021 10:05 AM (IST)
कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष कुमारी सैलजा और पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा एक कार्यक्रम में। जागरण आर्काइव

पंचकुला, अनुराग अग्रवाल। Haryana Politics पंजाब की सियासत में हुए बड़े बदलाव हरियाणा के दिग्गज कांग्रेसियों के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर नवजोत सिंह सिद्धू की नियुक्ति के साथ ही कैप्टन अमरिंदर सिंह की विदाई और मुख्यमंत्री के पद पर दलित कांग्रेस नेता चरणजीत सिंह चन्नी की ताजपोशी के दूरगामी राजनीतिक मतलब हैं। नवजोत सिंह सिद्धू को बड़े ही रणनीतिक ढंग से कैप्टन अमरिंदर सिंह के विरुद्ध इस्तेमाल कर लेने वाले कांग्रेस हाईकमान ने एक तीर से कई निशाने साधने में सफलता हासिल की है।

पिछले विधानसभा में कैप्टन अमरिंदर ने पंजाब के लोगों से यह कहकर वोट मांगे थे कि यह उनका आखिरी चुनाव है। कैप्टन जब मुख्यमंत्री बन गए तो 2022 के चुनाव नजदीक आते-आते उनकी महत्वाकांक्षा जाग गई और उन्होंने कांग्रेस हाईकमान को भरोसे में लिए बिना अगली बार फिर मुख्यमंत्री बनने की तैयारी शुरू कर दी। 79 साल के हो चुके कैप्टन की यह रणनीति न तो कांग्रेस हाईकमान को पसंद आई और न ही मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल अन्य नेताओं के गले उतरी। लिहाजा नवजोत सिंह सिद्धू नाम के हथियार से कांग्रेस ने अमरिंदर रूपी वटवृक्ष को धराशायी कर दिया।

इस रणनीति की धमक न केवल पड़ोसी राज्य हरियाणा में साफ सुनने को मिली, बल्कि इसमें जी-23 में शामिल पुराने उम्रदराज नेताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश भी है। जी-23 कांग्रेस के उन नेताओं का समूह है, जो कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की मांग करता रहा है। यह मांग करना कोई गलत बात भी नहीं है, लेकिन जी-23 के नेताओं का मानना है कि गैर गांधी परिवार के किसी दूसरे नेता को अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए। कैप्टन अमरिंदर सिंह अपनी शर्तो पर राजनीति करते रहे हैं। उन्होंने कभी सोनिया गांधी या राहुल गांधी को वैसे नहीं समझा, जिस तरह बाकी नेता समझते रहे हैं। यूं कह सकते हैं कि राजीव गांधी से अपनी मित्रता के चलते उन्होंने सोनिया गांधी या राहुल गांधी की कभी जी-हुजूरी नहीं की। पंजाब में चुनाव प्रचार के लिए वह राहुल गांधी की उपयोगिता भी नहीं मानते थे।

पंजाब के इस राजनीतिक घटनाक्रम का हम यहां इसलिए जिक्र कर रहे हैं, क्योंकि इसी तरह के हालात हरियाणा में भी हैं। हरियाणा में कांग्रेस का मतलब हुड्डा माना जाता है। अक्सर शांत रहने वाले भूपेंद्र सिंह हुड्डा हरियाणा के दो बार मुख्यमंत्री रहे हैं। भजनलाल को सत्ता से दूर रखकर हुड्डा मुख्यमंत्री बने थे। कांग्रेस सरकार में पूर्ण बहुमत नहीं होने के बावजूद उन्होंने निर्दलीय व हजकां के विधायकों को साथ मिलाकर सरकार चलाई।

2019 के विधानसभा चुनाव में हुड्डा को बिल्कुल भी नहीं लग रहा था कि कांग्रेस 31 सीटें जीत सकती है। कुमारी सैलजा हरियाणा कांग्रेस की अध्यक्ष हैं। हुड्डा को मुख्यमंत्री बनवाने में उनका बहुत योगदान रहा है। दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाली सैलजा की सोनिया तक सीधी पहुंच है। दलित समुदाय के ही अशोक तंवर एक समय हरियाणा कांग्रेस के अध्यक्ष थे। तब हुड्डा और उनके विधायक अशोक तंवर को न केवल पार्टी अध्यक्ष पद से हटवाने में कामयाब रहे, बल्कि उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता भी दिखवा दिया। यही सोच उनका सैलजा के प्रति भी रहा, लेकिन सैलजा वह लड्डू नहीं हैं, जिसे एकदम मुंह में रखकर निगल लिया जाए।

पंजाब के घटनाक्रम से कांग्रेस हाईकमान का एक तो यह संदेश स्पष्ट नजर आ रहा कि उसके सामने कितना भी ताकतवर नेता हो, वह अपनी सीमाओं में रहे तो अच्छा है। भले ही कांग्रेस और रसातल में चली जाए। इसके अलावा पंजाब में दलित समुदाय के चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर हाईकमान ने यह संदेश दिया है कि दलित, पिछड़े व शोषित उसके एजेंडे में शामिल हैं। कुमारी सैलजा महिला होने के साथ-साथ दलित हैं और केंद्रीय मंत्री रह चुकी हैं। इसलिए सैलजा की प्रदेश अध्यक्ष पद से छुट्टी होगी, इसकी संभावना बिल्कुल भी नहीं है। इतना जरूर है कि पंजाब के इस सियासी घटनाक्रम के बाद भूपेंद्र सिंह हुड्डा, कुमारी सैलजा, कुलदीप बिश्नोई, किरण चौधरी और कैप्टन अजय सिंह यादव सरीखे नेता यदि एक मंच पर आकर लड़ाई लड़ें तो पब्लिक व कार्यकर्ताओं में अच्छा संदेश दे सकते हैं।

हुड्डा जितने नरम और सहनशील हैं, उतने ही राजनीतिक रूप से छिपे रुस्तम भी हैं। हुड्डा के तरकश में पैने तीरों की कोई कमी नहीं है। उनका कौन सा तीर न जाने कहां निशाना साध दे, कहा नहीं जा सकता। रणदीप सुरजेवाला की केंद्रीय कांग्रेस में अपनी मजबूत पकड़ है। कुलदीप बिश्नोई के लिए न हुड्डा महत्वपूर्ण हैं और न सैलजा अहमियत रखती हैं। उन्हें जहां अपना राजनीतिक फायदा दिखेगा, वहीं जाएंगे। पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल की बहू किरण चौधरी की जाटों में अच्छी पकड़ है। अहीरवाल से कैप्टन अजय यादव आधा दर्जन बार विधायक रहे हैं। हुड्डा के सांसद बेटे दीपेंद्र सिंह केंद्र में राहुल और प्रियंका के करीबी हैं। ऐसे में हर कोई मौके और दांव की राजनीति करता दिखाई दे तो इसमें आश्चर्य नहीं होगा।

[स्टेट ब्यूरो चीफ, हरियाणा]

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