Haryana Politics: जिन नेताओं के लिए कुनबा बचाने की चुनौती, वे बुन रहे तीसरे मोर्चे का ख्वाब

Haryana Politics पूर्व उपप्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल की जयंती पर इनेलो की रैली होगी। इनेलाे सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला विभिन्‍न क्षेत्रीय दलों का तीसरा मोर्चे की इस रैली में घोषणा करवाने की तैयारी में हैं। लेकिन हकीकत है कि इनेलो सहित कई दलों के‍ लिए अपना कुनबा बचाने की चुनौती है।

Sunil Kumar JhaSat, 25 Sep 2021 02:30 AM (IST)
मुलायम सिंह यादव, एचडी देवगौडा और ओमप्रकाश चौटाला। (फाइल फोटो)

चंडीगढ़, [अनुराग अग्रवाल]। Haryana Politics: हरियाणा के जींद में शनिवार को चौधरी देवीलाल की जयंती पर आयोजित समारोह में जुटने वाले भाजपा विरोधी तमाम राजनीतिक दलों के सामने अपना खुद का कुनबा बचाए रखने की बड़ी चुनौती है। राष्ट्रीय राजनीति में कभी बड़ा नाम माने जाने वाले ये नेता जहां देश में भाजपा के विरुद्ध तीसरे मोर्चे के गठन का सपना देख रहे हैं, वहीं इनके अपने दलों में खींचतान और नेतृत्व का संकट बना हुआ है।

 तीसरे मोर्चे की नींव रखने का प्रयास कर रहे क्षत्रपों के दलों में ही खींचतान और नेतृत्व का संकट

जेबीटी (जूनियर बेसिक टीचर) भर्ती घोटाले में सजा पूरी होने के बाद इनेलो प्रमुख ओमप्रकाश चौटाला शनिवार को जींद में एक बड़ी रैली का आयोजन कर अपनी राजनीतिक पकड़ दिखाना चाह रहे हैं। जेल में सजा पूरी होने और इनेलो में बिखराव के बाद चौटाला की यह पहली बड़ी रैली है। इस रैली में ओम प्रकाश चौटाला ने अपने तमाम उन पुराने साथियों को आमंत्रित किया है, जिनकी भूमिका कभी वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बनाने में रही थी।

चौटाला ने पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, जनता दल यू के महासचिव केसी त्यागी, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के अलावा राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी को जींद की रैली में आमंत्रित किया है। नीतीश स्वयं तो नहीं पहुंचेंगे, लेकिन उनके प्रतिनिधि केसी त्यागी रैली में शिरकत करेंगे। रैली में शामिल होने वाले इन नेताओं की राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखें तो अधिकतर के सामने भाजपा के विरुद्ध तीसरे मोर्चे का गठन करने से ज्यादा अपना खुद का कुनबा बचाए रखने की बड़ी चुनौती है।

हरियाणा के पांच बार मुख्यमंत्री रहे ओम प्रकाश चौटाला की ही बात करें तो वह खुद अपने परिवार को राजनीतिक रूप से एक नहीं रख सके। चौटाला के दोनों बेटे अभय सिंह चाैटाला और अजय सिंह चौटाला अलग-अलग दलों की राजनीति कर रहे हैं।

बिहार से जनता दल यूनाइटेड की बात करें तो पिछले कुछ सालों के अंतराल में अगर देखा जाए तो जेडीयू लगातार कमजोर हुआ है। जीतन राम मांझी जेडीयू से अलग हुए तो रामबिलास पासवान की लोजपा भी अलग हो गई। बिहार में भले ही जनता दल यूनाइटेड की सीटें भाजपा से कम आईं, लेकिन वहां भाजपा ने बड़प्पन दिखाते हुए नीतीश कुमार को ही सत्ता सौंपी। दूसरी तरफ वही जेडीयू अब भाजपा के विरुद्ध तीसरे मोर्चे के गठन की बात कर रहा है।

घटता गया जयंत चौधरी का कद, टिकैत लड़ रहे अस्तित्व की लड़ाई

राष्ट्रीय लोकदल की अगर बात करें तो जयंत चौधरी का राजनीतिक कद लगातार कम होता जा रहा है। लोकदल के टिकट पर एक समय किसान नेता राकेश टिकैत ने चुनाव लड़कर मात्र आठ हजार वोट हासिल किए थे, लेकिन अब लोकदल के साथ-साथ राकेश टिकैत भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। लोकदल का अधिक प्रतिनिधित्व अब लोकसभा या विधानसभा में नहीं है और उनका वोट प्रतिशत लगातार घटता जा रहा है। ऐसे में भाजपा के विरुद्ध लड़ाई के अलावा जयंत चौधरी के सामने अपने खुद के दल को खड़ा करने की चुनौती भी कम नहीं है।

देवगौड़ा नहीं दिखा पाए जादू, बादल भी दोराहे पर

कर्नाटक में पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा अपना जादू नहीं दिखा पाए हैं। एक समय ऐसा भी था जब भाजपा का कर्नाटक में खास आधार नहीं था, लेकिन अब वहां भाजपा की सरकार बन चुकी है। देवगौड़ा के नेतृत्व वाले जनता दल में एक समय सभी नेता एकजुट होते थे, लेकिन आज सब बिखर चुके हैं। पंजाब में सरदार प्रकाश सिंह बादल अक्सर भाजपा के सहयोग से सत्ता में आते रहे हैं। जब तक वह भाजपा के साथ रहे, तब तक उनकी ताकत रही। ऐसे में पंजाब के लोग सवाल खड़ा कर सकते हैं कि बादलों के लिए पंजाब में भाजपा बड़ी ताकत है या इनेलो।

 परिवार की लड़ाई में कमजोर हुए मुलायम

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी की अगर बात करें तो एक समय वह काफी ताकत में थी, लेकिन पार्टी के बीच परिवार की आपसी लड़ाई ने उन्हें कमजोर कर दिया है। मुलायम के छोटे भाई शिवपाल अलग पार्टी बना चुके हैं।

फारुकअब्दुल्ला और महबूबा से कई नेता कर चुके किनारा

जम्मू-कश्मीर की अगर बात करें तो फारुक अब्दुल्ला की नेशनल कान्फ्रेंस से बड़े-बड़े लोग किनारा कर चुके हैं। यही स्थिति महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व की है। ऐसे में बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि तीसरे मोर्चे के गठन की बजाय यदि यह नेता अलग कोई पार्टी बनाकर अपना सर्वमान्य नेता चुनें और एक चुनाव चिन्ह जारी करें तो जनता में अच्छा संदेश जा सकता है। अन्यथा इसे तीसरे मोर्चे के गठन को राजनीतिक प्रोपेगेंडा से अधिक नहीं माना जाएगा।

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