नाबालिग लड़की अगर लिव-इन में रहकर सुरक्षा मांगे तो यह बाल विवाह कानून का उल्लंघन, हरियाणा के मामले पर हाई कोर्ट की टिप्पणी

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप में रह रही हरियाणा की नाबालिग लड़की की सुरक्षा की मांग की याचिका पर पंजाब हरियाणा व चंडीगढ़ को बाल विवाह की बुराई पर रोक लगाने के लिए कहा है।

Kamlesh BhattMon, 14 Jun 2021 06:28 PM (IST)
नाबालिग लड़की के लिव इन रिलेशनशिप पर हाई कोर्ट की टिप्पणी। सांकेतिक फोटो

चंडीगढ़ [दयानंद शर्मा]। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने बाल विवाह की बुराई पर रोक लगाने के लिए हरियाणा, पंजाब व चंडीगढ़ को नसीहत दी है कि ऐसे मामलों में गंभीरता से काम किया जाए तथा बाल विवाह रोकने के लिए संबंधित राज्य उचित कदम उठाएं। हाई कोर्ट के जस्टिस मनोज बजाज ने यह आदेश एक प्रेमी जोड़े की सुरक्षा की मांग को खारिज करते हुए दिया।

इस मामले में याचिकाकर्ता युवक की आयु 20 वर्ष दो महीने और याचिकाकर्ता लड़की की आयु 14 वर्ष आठ महीने है, जिन्होंने हाई कोर्ट में दावा किया था कि वह दोनों प्यार करते हैं, लेकिन लड़की के माता-पिता उनके रिश्ते का विरोध कर रहे हैं। कोर्ट को बताया गया कि लड़की ने एक जून 2021 को अपना घर छोड़ कर विवाह योग्य आयु होने तक लिव-इन-रिलेशनशिप में साथ रहने का फैसला किया।

उन्हें आशंका है कि लड़की के माता-पिता उन्हें मार देंगे। उन्होंने पुलिस अधीक्षक सिरसा को एक मांग पत्र भी दिया था, लेकिन उनको कोई सुरक्षा प्रदान नहीं की गई है, इसलिए याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने जोर देकर कहा कि लड़की मात्र 14 साल और आठ महीने की है और इस समय नाबालिग है।

कोर्ट ने 2017 के सुप्रीम कोर्ट के केस का हवाला देकर कर कहा कि शीर्ष कोर्ट ने इस विषय पर बाल विवाह के प्रतिकूल प्रभावों का गहराई से विश्लेषण किया गया था। कोर्ट ने कहा था कि वास्तव में बाल विवाह की प्रथा भले ही परंपरा और रीति-रिवाज के अनुसार पवित्र हो, लेकिन इसके हानिकारक प्रभावों के बारे में जागरूकता फैलाना जरूरी है। क्या ऐसी पारंपरिक प्रथा अभी भी जारी रहनी चाहिए? हम ऐसा नहीं सोचते हैं और जितनी जल्दी इसे छोड़ दिया जाना चाहिये। यह बालिकाओं और समग्र रूप से समाज के हित में होगा।

लड़के के बारे में कोर्ट ने कहा कि वह लड़की का प्रतिनिधित्व कर रहा है और उसकी याचिका में नाबालिग लड़की के अभिभावकों पर पूरा दोष लगा दिया गया, ताकि यह जताया जा सके कि परिस्थितियों से मजबूर होकर लड़की ने स्वेच्छा से अपने माता-पिता का घर छोड़ा है और लड़के के साथ रहने लग गई है। इसके अलावा, कोर्ट ने पाया कि लड़के पर पहले से ही नाबालिग बेटी के अपहरण का आरोप है, इसलिए कोर्ट ने कहा कि खुद को नाबालिग लड़की के वैध प्रतिनिधि के रूप में दावा करने का उसकी स्वीकृति स्वीकार करने लायक नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि अजीब है कि याचिकाकर्ता लड़के ने यह नहीं बताया कि नाबालिग लड़की ने घर छोड़ने के बाद अपने माता-पिता के खिलाफ पुलिस में कोई शिकायत क्यों नहीं की या माता-पिता के साथ अपने मतभेदों को सुलझाने के लिए क्यों किसी अन्य करीबी रिश्तेदार से संपर्क नहीं किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि वर्तमान याचिका जल्दबाजी में दायर की गई है, ताकि लड़के पर अपहरण के आरोप में दर्ज मामले में कार्रवाई से बचा जा सके।

हाई कोर्ट ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक सिरसा को एक जिम्मेदार पुलिस अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश देते हुए कहा कि यह सुनिश्चित किया जाए कि नाबालिग लड़की की कस्टडी वापस उसके माता-पिता को सौंपी जा सके। कोर्ट ने इस आदेश की कापी हरियाणा, पंजाब के मुख्य सचिव व चंडीगढ़ प्रशासक के सलाहकार को भेजने के निर्देश देते हुए कहा कि सुप्रीम काेर्ट द्वारा बाल विवाह निषेध पर 2017 में दिए गए निर्देश व सुझावों पर गंभीरता से अमल कर कार्रवाई की जानी चाहिए।

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