हरियाणा में अभय चौटाला के सामने इनेलो वर्करों को ताकत से खड़ा रख पाने की बड़ी चुनौती

ऐलनाबाद विधानसभा चुनाव में भले ही इनेलो नेता अभय सिंह चौटाला ने विरोधियों को धूल चटा दी हो लेकिन पार्टी को एकसूत्र में पिरोए रखने उनके सामने चुनौती है। पार्टी पिछले 16 वर्षों से सत्ता से दूर है।

Kamlesh BhattSun, 07 Nov 2021 11:29 AM (IST)
इनेलो नेता अभय सिंह चौटाला की फाइल फोटो।

राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के महासचिव अभय सिंह चौटाला भाजपा-जजपा-हलोपा गठबंधन के उम्मीदवार गोबिंद कांडा को हराकर भले ही ऐलनाबाद उपचुनाव जीत गए, लेकिन उनकी चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। करीब 16 साल से सत्ता से दूर चल रहे अभय सिंह चौटाला के सामने जहां संगठन को मजबूती प्रदान करते हुए कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़े रखने की बड़ी चुनौती है, वहीं सत्ता में भागीदार अपने भाई अजय सिंह चौटाला और भतीजे दुष्यंत चौटाला के राजनीतिक दांव को कामयाब नहीं होने देने का दबाव भी कम नहीं रहेगा।

हरियाणा विधानसभा में विपक्ष के नेता रह चुके अभय सिंह चौटाला पांचवीं बार विधायक बने हैं। उन्हें सबसे कम उम्र में पांच बार विधायक बनने का मौका मिला है। तीन कृषि कानूनों का विरोध करते हुए अभय सिंह ने किसान संगठनों के कहने पर ऐलनाबाद सीट से इस्तीफा दे दिया था। प्रदेश के 90 विधायकों में अभय चौटाला एकमात्र विधायक थे, जिन्होंने विधानसभा की सदस्यता को छोड़ी। अभय सिंह को उम्मीद थी कि उपचुनाव में वह 20 से 25 हजार मतों के अंतर से जीत हासिल कर सकते हैं, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। उनकी जीत का अंतर पौने सात हजार वोट रहा है।

भाजपा-जजपा और हलोपा गठबंधन के उम्मीदवार गोबिंद कांडा ने जिस तरह पूरी ताकत के साथ ऐलनाबाद का उपचुनाव लड़ा, उसके मद्देनजर अभय सिंह चौटाला की पौने सात हजार मतों से हुई जीत के भी बड़े मायने हैं। अभय के भतीजे दुष्यंत अपने चाचा की इस जीत को जीत नहीं मानते, जबकि अभय के बेटे अर्जुन को लगता है कि उनके पिता ने भाजपा-जजपा व हलोपा के साथ रणनीतिक तौर पर साझीदार हो चुकी कांग्रेस को आइना दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इससे अभय सिंह की राजनीतिक ताकत तो बढ़ी ही, साथ ही उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं में भी नए जोश का संचार हुआ है।

अभय सिंह सोमवार को विधानसभा के सदस्य के रूप में शपथ लेंगे। विधानसभा के विशेष और शीतकालीन सत्र में वह एक बार फिर गठबंधन व कांग्रेस पर हमलावर नजर आ सकते हैं। 2019 के चुनाव में अभय सिंह अपनी पार्टी के अकेले विधायक थे, लेकिन विधानसभा के बजट और मानसून सत्र में अभय सिंह की गैरमौजूदगी इनेलो कार्यकर्ताओं को खासी खली है।

अभय सिंह का राजनीतिक औरा ही कुछ अलग तरह का है। उनकी जीत से कार्यकर्ताओं का मनोबल तो बढ़ा है, लेकिन संगठन को खड़ा कर कार्यकर्ताओं को सत्ता में वापसी का भरोसा दिलाने की चुनौती बरकरार है। जजपा का वर्कर भी कभी इनेलो का वर्कर रहा है। अब चूंकि दुष्यंत ने इन वर्करों की सुनवाई शुरू कर दी है, ऐसे में अभय सिंह को इन पार्टी वर्करों को अपने साथ बनाए रखने की मुश्किल का बड़े ही रणनीतिक ढंग से सामना करना पड़ सकता है। इन वर्करों को अपने साथ जोड़े रखने के लिए अभय सिंह जितनी मेहनत करेंगे, उससे कहीं अधिक मेहनत दुष्यंत उन्हें सत्ता में भागीदार बनाने के लिए रणनीति बना सकते हैं। लिहाजा चौटाला परिवार की वर्करों को लेकर यह खींचतान नए समीकरण पैदा कर सकती है।

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