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मां की ममता से ज्यादा कोविड की जिम्मेदारी

मां की ममता से ज्यादा कोविड की जिम्मेदारी
Publish Date:Wed, 08 Jul 2020 05:29 PM (IST) Author: Jagran

ज्ञान प्रसाद, नारनौल:

जिम्मेदारी ही ऐसी है कि अपने बच्चों से ज्यादा बीमार लोगों की तीमारदारी करनी पड़ रही है। भले सरकार ने लॉकडाउन समाप्त कर लोगों को अपनी सुरक्षा का ध्यान रखते हुए सामान्य जीवन जीने की छूट दी हो लेकिन चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों का जीवन आज भी पहले की तरह जोखिम और चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। जिला के पटीकरा स्थित कोविड अस्पताल में कार्यरत चिकित्सक, स्टाफ नर्स और अन्य स्टाफ सदस्य लगातार अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। इसी टीम की सदस्य स्टाफ नर्स पूनम यादव अपनी डेढ़ साल की बेटी से दो माह से नहीं मिली हैं। यहां तो वे 29 जून से ड्यूटी दे रही हैं। इससे पहले कनीना स्थित सरकारी अस्पताल में ड्यूटी देते हुए भी वहीं अपना घर होने के बावजूद अपनी बच्ची से नजरें चुराकर कमरे तक जाती रहीं। वर्तमान में वे कोविड अस्पताल में आने वाले कोरोना संक्रमित लोगों की देखभाल, दवा, इंजेक्शन लगाने के साथ खान पान का ध्यान रखते हुए सेवा कर रही हैं। इससे पहले कनीना स्थित सरकारी अस्पताल में आने वाले संभावित लोगों की चिकित्सकों के साथ कोविड सैंपलिग में सहयोग और परामर्शदाता के रूप में काम करती रहीं। वे कहती हैं कि अपनी डेढ़ साल की यशवी तथा दस वर्षीय बेटी माही को गोद लेने, बात करने का तो मन करता है लेकिन कोविड का डर उन्हें अपने कदम पीछे खींचने को मजबूर करता है। इसलिए पूनम की सास ही मां और दादी की भूमिका निभा रही हैं। पूनम के पति प्रशांत यादव निजी कंपनी में काम करते हैं। पूनम कहती हैं कि परिवार के सदस्य हिम्मत बढ़ा रहे हैं कि इससे बड़ा पुण्य का काम नहीं हो सकता। यही हौसला उन्हें अपनी जिम्मेदारी में संबल प्रदान कर रहा है।

छूट गया बच्ची का स्तनपान भी:

जब से उनकी कोविड-19 में ड्यूटी लगी है तभी से लगभग दो माह से नन्हीं बच्ची का स्तनपान भी छूट गया। ऐसे में एक मां के लिए इससे बड़ा त्याग क्या हो सकता है। कोविड अस्पताल में सात दिन तक 24 घंटे की ड्यूटी लगती है। इस दौरान कोविड संक्रमित लोगों की संख्या अधिक होती है तो काम और भी जोखिम भरा हो जाता है। गंभीर मरीज आता है तो उसे ऑक्सीजन देना, टीका लगाना, दवा खिलाने के साथ खाने पीने का ध्यान रखने और साफ सफाई की व्यवस्था कराने की जिम्मेदारी स्टाफ नर्स की होती है। ऐसे में थोड़ी सी लापरवाही स्टाफ के लिए भारी पड़ सकती है। इस कारण वह अपनी ड्यूटी के बाद सात दिन तक होम आइसोलेट होने पर भी माता पिता, पति और बच्चियों से नहीं मिलतीं। अपना ममत्व काव्य रचना में किया बखान:

सेवाभाव और ममत्व की भावना को ड्यूटी के दौरान मिले समय में कविता बनाकर बयां कर रही हैं। वे कहती हैं कि 'ऊपर बैठी मां नीचे रोती बेटी की आवाज है सुन सकती, कलेजा है फटता उसका पर नहीं कुछ कर सकती। कैसे सुनाऊं कैसे बताऊं दर्द मैं, उस मां का जो आई है अभी करके ड्यूटी कोरोना में, कैसे रहती है, कैसे रोती है वो छुपकर अपने बच्चों से अपने ही घर के एक कोना में। ढूंढती है वो नन्हीं सी बच्ची, मां को अपनी घर के हर एक कमरे में, देखकर बेटी की ये हालत वो बेबस मां है सुन और जाने को सदमें में।' इसी क्रम में वे कहती हैं कि उन्होंने देशभक्ति और मानव जाति के कल्याण के लिए काम किया है। समाज उन्हें क्या सम्मान देता है यह अलग बात है।

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