भक्ति का अर्थ भक्त को भगवान के निकट ले जाना : अयोध्या दास

बजरंग दल बारात घर में आयोजित नौ दिवसीय श्री राम कथा महोत्सव में स्वामी अयोध्या दास ने भक्ति मार्ग की विस्तार से जानकारी दी।

JagranWed, 06 Oct 2021 09:17 PM (IST)
भक्ति का अर्थ भक्त को भगवान के निकट ले जाना : अयोध्या दास

संवाद सूत्र, नीलोखेड़ी : बजरंग दल बारात घर में आयोजित नौ दिवसीय श्री राम कथा महोत्सव में स्वामी अयोध्या दास ने भक्ति मार्ग की विस्तार से जानकारी दी।

उन्होंने कहा कि भक्ति शब्द की उत्पत्ति भज धातु से हुई है, जिसका अर्थ सेवा करना या भजना है, अर्थात श्रद्धा और प्रेमपूर्वक इष्ट देवता के प्रति आसक्ति। नारद भक्ति सूत्र में भक्ति को परम प्रेमरूप और अमृतस्वरूप कहा गया है। इसे प्राप्त कर मनुष्य कृतकृत्य, संतृप्त और अमर हो जाता है। व्यास ने पूजा में अनुराग को भक्ति कहा है। कथा श्रवण में अनुरक्ति ही भक्ति है। भारतीय धार्मिक साहित्य में भक्ति का उदय वैदिक काल से ही दिखाई पड़ता है। महान वह है जो चेतना के स्तरों में मूर्धन्य है।

उन्होंने कहा कि मानव चिरकाल से एक अनादि सत्ता (ब्रह्म) में विश्वास करता आया है। भक्ति साधन तथा साध्य द्विविध है। साधक साधन में ही जब रस लेने लगता है, उसके फलों की ओर से उदासीन हो जाता है। यही साधन का साध्य बन जाता है। प्रत्येक साधन का पृथक फल है। भक्ति भी साधक को पूर्ण स्वाधीनता, पवित्रता, एकत्वभावना तथा प्रभुप्राप्ति जैसे मधुर फल देती है। प्रभुप्राप्ति का अर्थ जीव की समाप्ति नहीं है।

इस मौके पर प्रवचन से पूर्व गणमान्य व्यक्तियों ने दीप प्रज्ज्वलित किया और श्री सनातन धर्म नीलनगर के पुजारी पंडित जगदीश चन्द्र आरती की स्तुति की। भक्तों ने कथावाचक को शाल देकर सम्मानित किया। इस अवसर पर रविन्द्र कत्याण, विजय अरोडा, वेद कटारिया, माटेक चंद, ओम प्रकाश चावला, वीरभान चावला, सतीश जोशी, लक्ष्मणदास अरोडा मौजूद थे।

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