मानसून ने बिगाड़ा धान रोपाई का सिस्टम, बरसात की कमी से सूख रहे खेत

प्री-मानसून के धोखे ने किसानों की खेती का सिस्टम बिगाड़ दिया है। बारिश न होने के कारण खेतों में फसल सूख रही हैं।

JagranFri, 09 Jul 2021 06:40 AM (IST)
मानसून ने बिगाड़ा धान रोपाई का सिस्टम, बरसात की कमी से सूख रहे खेत

संवाद सहयोगी, घरौंडा : प्री-मानसून के धोखे ने किसानों की खेती का सिस्टम बिगाड़ दिया है। बरसात की कमी से खेतों में सिचाई का दारोमदार ट्यूबवेलों पर टिका हुआ है। पानी के अभाव में धान के खेतों में दरारें तक आ चुकी हैं और अन्य खेतों में पानी की किल्लत साफ देखी जा सकती है। आंकड़ों की माने तो जहां बीते वर्ष जून माह तक 252 एमएम बरसात हुई थी, वहीं इस बार जून माह तक महज 156.5 एमएम ही बरसात हुई। मार्च और अप्रैल पिछले साल के मुकाबले सूखा ही रहा।

धान की खेती में बरसात सबसे बड़ी भूमिका निभाती है और अबकी बार मानसून में देरी है। कृषि कार्यालय से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष-2020 में बदरा झूम के बरसे और पिछले चार सालों का रिकार्ड टूट गया। पिछले साल 57 दिनों में कुल 788.5 एमएम बारिश हुई। जबकि वर्ष-2016 में 39 दिन के दौरान 414 एमएम, वर्ष-2017 में 41 दिन में 411 एमएम, वर्ष-2018 में 41 दिन में 471.5 एमएम वर्षा हुई। वहीं 2019 में 34 दिन बरसात हुई, जो रिकार्ड में 351 एमएम दर्ज की गई। यदि वर्ष-2020 में जून माह तक हुई बरसात के मासिक आंकड़ों को देखें तोजनवरी में 48 एमएम, फरवरी में 24 एमएम, मार्च में 53 एमएम, अप्रैल में 27 एमएम, मई में 56 एमएम और जून में 44 एमएम बारशि हुई। जबकि इस वर्ष जनवरी माह में 45 एमएम, फरवरी में 10 एमएम, मार्च में जीरो एमएम, अप्रैल में 1.5 एमएम, मई में 45.5 व जून में 54.5 एमएम वर्षा हुई थी। पिछले साल जून तक 32 दिन बरसात हुई और इस वर्ष जून तक महज 11 दफा बरसात हुई है। जिससे खेतों में पानी की पूर्ति नहीं हो पाई और सिचाई का भार ट्यूबवेलों पर आ गया। 25 जून तक कवर हो चुका था 50 फीसद एरिया

सरकार ने धान रोपाई के लिए 15 जून तक का समय निर्धारित किया हुआ है। इससे पहले धान की फसल नहीं लगाई जा सकती, लेकिन जून माह में तीन दिन तक हुई बारिश ने किसानों में प्री-मानूसन की उम्मीद जगा दी और 10 जून से ही किसानों ने धान लगाना शुरू कर दिया। खंड कृषि अधिकारी डा. राहुल दहिया के मुताबिक, किसानों ने पीआर-114 जल्दी लगा दी, जबकि किसान पहले 1121 किस्म लगाते थे, जो पूरे जुलाई महीने तक लगाई जाती थी। लेकिन इस बार 25 जून तक ही घरौंडा क्षेत्र के 50 फीसद हिस्से में धान की रोपाई हो चुकी थी, जबकि 25 जून तक महज 10 फीसद एरिया में ही धान लग पाती थी। इसी जल्दबाजी का खामियाजा आज किसानों को भुगतना पड़ रहा है और अब तक लगभग 15 फीसद एरिया ही बिना रोपाई के है। अब कहीं पर खेतों में दरारें आ गई हैं तो कहीं पर फसल में पानी की कमी हो चुकी है। जिसका असर फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों पर ही पड़ेगा। किसानों को चाहिए कि वे किसी एक किस्म के पीछे ना भागे अपितु सभी प्रकार की किस्में अपने खेतों में लगाए। धान की फसल में होती है पानी की सबसे ज्यादा खपत

पानी की खपत सबसे ज्यादा धान की फसल में होती है। विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक, एक किलो चावल पैदा करने में लगभग 3600 लीटर पानी की खपत होती है। यदि एक एकड़ में 20 क्विंटल की पैदावार है तो उसमें से अनुमानित 65 फीसद चावल निकलता है यानी 1500 किलोग्राम। 1500 किलोग्राम को 3600 लीटर पानी से गुणा करें तो प्रति एकड़ 54 लाख लीटर पानी की खपत होती है और घरौंडा ब्लाक में 65 हजार एकड़ में धान की खेती होती है। ऐसे में 54 लाख को 65 हजार से गुणा किया जाए तो 3.51 खरब लीटर पानी का दोहन होता है। यह सिर्फ एक एक ब्लाक का आंकड़ा है। अब पूरे हरियाणा में धान की फसल में होने वाली पानी की खपत का अनुमान स्वयं लगाया जा सकता है।

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