कृषि खाद्य सुरक्षा से आएगा बड़ा बदलाव: डा. समर

अंतरराष्ट्रीय मक्का और गेहूं सुधार केंद्र बोरलाग इंस्टीट्यू

JagranTue, 07 Dec 2021 08:01 AM (IST)
कृषि खाद्य सुरक्षा से आएगा बड़ा बदलाव: डा. समर

जागरण संवाददाता, करनाल:

अंतरराष्ट्रीय मक्का और गेहूं सुधार केंद्र, बोरलाग इंस्टीट्यूट फार साउथ एशिया व केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के तत्वाधान में 11वां संरक्षित कृषि आधारित आधुनिक प्रशिक्षण गेटवे फार प्रोडक्टिव एंड सस्टेनेबल क्रापिग सिस्टम शुरू हुआ। यह कार्यक्रम 18 दिसंबर तक करनाल व लुधियाना में चलेगा। समारोह में मुख्य अतिथिमहाराणा प्रताप उद्यानिकी विश्वविद्यालय के उपकुलपति डा. समर सिंह ने कहा कि कृषि क्षेत्र खाद्य सुरक्षा का मुख्य आधार है। कृषि खाद्य सुरक्षा से ही मनुष्यों की दिनचर्या व आजीविका को बदला जा सकता है।

प्रशिक्षण में आइसीएआर नई दिल्ली के कृषि विज्ञान केन्द्र, अनुसंधान संस्थान, अनुसंधान परियोजनाएं व कृषि विश्व विद्यालयों के कुल 16 वैज्ञानिक, विषय विशेषज्ञ, सहायक प्रोफेसर व विद्यार्थी भाग ले रहे हैं। केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के निदेशक डा. पीसी शर्मा ने डा. समर सिंह का स्वागत किया। डा. समर सिंह ने कहा कि 90वें दशक में खाद्य उत्पादन काफी कम था लेकिन कृषि क्षेत्र में विकास से इसे बढ़ाया जा रहा है। प्राकृतिक संसाधनों से होने वाले नुकसान को भी कम किया जा रहा है। संरक्षित खेती द्वारा पिछले दो दशकों से शून्य जुताई पद्धति के द्वारा गेहूं में मंडूसी से होने वाले नुकसान को काफी कम किया गया है। इससे पानी व मजदूरी की भी बचत संभव है।

विशिष्ट अतिथि एवं संस्थान के निदेशक डा. प्रबोध चंद्र शर्मा ने कहा कि संरक्षित खेती बहुआयामी पहल है। इससे उपज बढ़ा सकते हैं। धान-गेहूं फसल गंगा मैदानी क्षेत्र की मुख्य फसलें हैं। लेकिन अधिक खाद-पानी के कारण फसल उत्पादकता में काफी कमी आ गई है। भारत में 6.23 मिलियन हैक्टर लवणग्रस्त मृदाएं हैं बढ़ती जा रही हैं। इस मृदा स्वास्थ्य में गिरावट, फसल उत्पादकता में कमी, भू-जल का खराब होना व मौसम में बदलाव आ रहा है। इसे सरंक्षित खेती अपनाकर कम किया जा सकता है। 2009 से सिमिट के साथ मिलकर इस पर कार्य कर रहे हैं। किसानों को इन विधियों के बारे में प्रशिक्षण दे रहे हैं।

उन्होंने बताया कि घटते भूजल को ध्यान में रखते हुए उपसतही ड्रिप सिचाई के द्वारा जल का कम उपयोग व फसल की उपज को बढ़ाना मुख्य उद्देश्य है। फसल का मुख्य स्त्रोत, मृदा कार्बनिक पदार्थ है जो दस वर्ष पहले 0.4 से 0.5 प्रतिशत था लेकिन अब संरिक्षत खेती के बाद यह 0.9 व उससे अधिक हो गया है। जिसके कारण मृदा के भौतिक व रासायनिक कारकों में काफी वृद्धि आ गई है। फसल के दानों में प्रोटीन की गुणवत्ता में बढ़ोत्तरी हो रही है। डा. एमएस जाट ने कहा कि महिलाओं को संरक्षित खेती के बारे में प्रशिक्षण देना मुख्य उद्देश्य है। इस प्रशिक्षण की शुरूआत 2010 में पीएयू, बीसा, सीएसएसआरआई के साथ मिलकर की। आज तक 500 से ज्यादा प्रशिक्षणार्थियों को संरक्षित खेती के बारे में जानकारी दी गई। संरक्षित खेती पर अंतरराष्ट्रीय देशों जैसे चीन, ईरान, अफगानिस्तान, बंगलादेश और भारत के साथ मिलकर संरक्षित खेती की तकनीकों को बढ़ाया गया है। मंच संचालन प्रधान वैज्ञानिक डा. एचएस जाट ने किया।

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