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कलायत क्षेत्रमें छह दशक पहले दी थी टिड्डी दल ने दस्तक

संवाद सहयोगी, कलायत : देश में टिड्डी दल ने इन दिनों पहली बार दस्तक नहीं दी। समय-समय पर लोगों को इस संकट से जूझना पड़ता रहा है। इस समस्या से कलायत इलाके के लोग भी करीब छह दशक पहले जंग लड़ चुके हैं। उस दौरान महिलाओं, बड़े-बुजुर्गों, बच्चों और युवाओं ने इस संकट का डटकर मुकाबला किया था। थाली व अन्य संसाधनों से कंपन एवं तेज ध्वनि से क्षेत्र को टिड्डी दल के हमले से बचाया था।

श्री कपिल मुनि धाम के मुख्य पुजारी वेद प्रकाश गौतम ने बताया कि जब वे चौथी कक्षा के छात्र थे तब अचानक टिड्डी दल ने कलायत इलाके का बुरी तरह से घेराव कर लिया था। हालात इस कदर खराब हो गए थे कि नभ को टिड्डियों के समूह ने ढांप दिया था और दिन में भी रात का आभास हो रहा था।

टिड्डियों के इस घेराव के कारण इलाके में दहशत का माहौल बन गया था। उस दौर में तत्कालीन सरकार और प्रशासन की हिदायत पर घरों और खलिहानों से विभिन्न माध्यमों से ध्वनि का संचार निरंतर घंटों किया गया था। तब तीन-चार दिनों में आम जन मानस टिड्डियों के चक्रव्यूह से बाहर आया था। छह दशक के लंबे अरसे के बाद 21वीं सदी में वे पहली बार इस प्रकार की गंभीर समस्या को देख रहे हैं।

वर्तमान में जहां देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है वहीं देश के विभिन्न हिस्सों में टिड्डियों ने फसलों को बड़ा नुकसान पहुंचा रही हैं। टिड्डियों के हमले से किसानों की फसलें तबाह हो रही हैं। वर्ष 1993 में भी टिड्डियों का बड़ा हमला देश के कृषि जगत पर हुआ था। अब जिस प्रकार कोरोना संकट के बीच टिड्डियों की समस्या ने सिर उठाया है वह बेहद चिता का विषय बना हुआ है।

फिलहाल जिले में नहीं टिड्डी दल की गतिविधियां:

कलायत खंड कृषि अधिकारी डॉ. रामेश्वर श्योकंद और कृषि अधिकारी डा.जगबीर लांबा ने बताया कि जिला कैथल फिलहाल पूरी तरह टिड्डी दल की गतिविधियों से मुक्त है। अगर किसी को भी इनका दल कम या ज्यादा मात्रा में नजर आए तत्काल प्रशासन को अवगत करवाएं। कनस्तर, ढोल, डीजे, घंटाल और ध्वनि-कंपन उत्पन्न करने वाले यंत्रों को बजाया जाए। ताकि टिड्डी दल को डेरा डालने का अवसर न मिले। इसके साथ ही सरकार और प्रशासन द्वारा इस दिशा में विभिन्न स्तरों में अन्य प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं।

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