भारत विश्व की सांस्कृतिक राजधानी: श्रेयांश द्विवेदी

जागरण संवाददाता, कैथल : महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय मूंदड़ी के कुलपति डा. श्रेयांश द्विवेदी ने कहा कि इतिहास के बिना भारतीय संस्कृति कि कल्पना असंभव है। भारत की भूमि अपर्ण व तपर्ण की भूमि है। इतिहास को अगर अच्छे से जानना है तो हमें अपनी प्राचीन शिक्षा पद्धति पर लौटना होगा। श्रेयांश द्विवेदी यहां आरकेएसडी कॉलेज में भारतीय इतिहास संकलन समिति की तरफ से डॉ. दामोदर वशिष्ठ की स्मृति में आयोजित गोष्ठी में बतौर मुख्यातिथि बोल रहे थे। गोष्ठी का विषय वैदिक कपिस्थल से वर्तमान कैथल तक था। कार्यक्रम का मंच संचालन इतिहास संकलन समिति के अध्यक्ष कमलेश शर्मा ने किया, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में आरकेएसडी कॉलेज के कोषाध्यक्ष सुनील चौधरी, सरस्वती विकास बोर्ड के सदस्य डॉ. शशीपाल सेठ पहुंचे थे। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता समिति के प्रांतीय मार्गदर्शक प्रो. बीबी भारद्वाज, अतिरिक्त सैशन जज चन्द्रशेखर विशिष्ठ थे। अध्यक्षता आरकेएसडी कॉलेज के प्रधान साकेत मंगल एडवोकेट ने की। संचालन डॉ. चतुरभूज बंसल ने अपनी कविताओं से किया। कुलपति डॉ. श्रेयांश द्विवेदी ने कहा कि शरीर और गुण में अंतर है। शरीर एक दिन नष्ट हो जाता है जबकि गुणों की पूजा होती है। गुणों के कारण ही डॉ. दामोदर वशिष्ठ को आज याद किया जा रहा है। इसी प्रकार विनम्रता से ही आप पात्र बनते हैं। भारत विश्व की सांस्कृतिक की राजधानी है। इतिहास को बचाने के लिए इतिहास पुरुषों को याद करना पड़ेगा जिस प्रकार हम आज श्रेद्धय दामोदर वशिष्ठ को याद कर रहे हैं। द्विवेदी ने कहा कि समाज के लिए शिक्षा और संस्था का होना बेहद जरूरी है। समिति के उपाध्यक्ष डा. अशोक अत्री व डॉ. हरीश झंडई ने किया। साकेत मंगल ने ने कहा कि इतिहास देश ही नहीं बल्कि विश्व से जोड़ता है। इतिहास संकलन का एक बहुत बड़ा काम होता है। इतिहास अगर हथिया है तो इसे धार दें इससे देश विश्व का भला होगा। इस मौके पर प्राचार्य संजय गोयल, नवनीत गोयल, प्रो. पीसी मित्तल, प्रो. बीडी गुप्ता, रतन लाल शर्मा, चेयरमैन कृष्ण कौशिक, सोहन लाल गुप्ता उपस्थित थे।

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