जीवन मुक्त स्वरूप दिव्य चेतनाएं ही कर सकती हैं शिष्य का आध्यात्मिक विकास:दिव्यानंद

शहर के किला मोहल्ला स्थित अयोध्यापुरी में दो दिवसीय श्रीसद्गुरु आराधना (व्यास पूजा) पर्व का शुभारंभ हुआ। इसमें तपोवन हरिद्वार से डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज ने शिरकत की। कार्यक्रम में काफी श्रद्धालु मौजूद रहे। पूरे विधि-विधान से पूजा अर्चना की गई।

JagranFri, 30 Jul 2021 06:33 AM (IST)
जीवन मुक्त स्वरूप दिव्य चेतनाएं ही कर सकती हैं शिष्य का आध्यात्मिक विकास:दिव्यानंद

बहादुरगढ़, (विज्ञप्ति): शहर के किला मोहल्ला स्थित अयोध्यापुरी में दो दिवसीय श्रीसद्गुरु आराधना (व्यास पूजा) पर्व का शुभारंभ हुआ। इसमें तपोवन हरिद्वार से डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज ने शिरकत की। कार्यक्रम में काफी श्रद्धालु मौजूद रहे। पूरे विधि-विधान से पूजा अर्चना की गई। श्रद्धालुओं को प्रवचन देते हुए डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज ने कहा कि आज आत्मज्ञानी, भगवत प्राप्त गुरुदेव वास्तव में ही दुर्लभ हैं, जबकि ऐसे जीवन मुक्त स्वरूप दिव्य चेतनाएं ही शिष्य का आध्यात्मिक विकास कर सकती हैं। उपदेश तो माध्यम है जो ज्ञान, शिष्य और गुरुदेव के मध्य एक कड़ी है। गुरु होने का दावा या क‌र्त्तव्य तब तक नहीं होना चाहिए, जब तक इस रूप में प्रभु कृपा न हो जाए। वैसे तो यथार्थ में गुरुदेव कभी भी कोई दावा या प्रदर्शन नहीं करते। यह सब तो अहंकार का ही विस्तार होता है, जबकि तत्वनिष्ठा होने के बाद अहंकार का विसर्जन हो जाता है। केवल रसीले प्रवचनों से व्यास मंचों से लोगों को प्रभावित तो किया जा सकता है। उनके हृदयों को प्रकाशित नहीं किया जा सकता। जब तक हृदय प्रकाशित न हो तो अज्ञान का अंधेरा कैसे मिटेगा और बिना अंधेरा मिटे व्यक्ति ठोकरों से भी कैसे बच पाएगा। श्री जय दुर्गा मंदिर में श्री गीता प्रचार समिति द्वारा आयोजित श्री सद्गुरु आराधना पर्व (व्यास पूजा) पर डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज ने कहा कि आज ज्ञान, भक्ति, तीर्थ, व्रत, पूजा और गुरु ये सब शब्द तो प्रयोग हो रहे हैं, कितु इनके वैदिक और आध्यात्मिक अर्थ खो गए हैं। मनमर्जी के कुछ उदंड प्रकृति के भक्तों ने अपनी सुविधानुसार अर्थ कर इसे पूरी तरह एक व्यापार ही बना डाला है। लोगों की श्रद्धा को बुरी तरह आहत किया जा रहा है। फिर भी प्रभु कृपा है कि कुछ दिव्य महापुरुष अपनी ज्ञान भक्ति की निष्ठा में सत्त रमण करते हुए समाज को मार्गदर्शन कर रहे हैं। ऐसे भगवत प्राप्त महापुरुषों की शरण में ही आध्यात्मिक विकास संभव है। सभी साधकों को इस पावन पर्व पर यही प्रेरणा लेनी चाहिए। इस अवसर पर प्रवीण अरोड़ा, निर्मला कांत, नरेंद्र, यशपाल गांधी, तिलकराज, कैलाश राठौर, रमन सुखीजा, संजय, प्रीति, इशान, सरोज बंसल, शुभम गुप्ता, संजीव मलिक, कृष्ण चावला, विजेंद्र राठी, ललित यादव, संदीप आर्य, राजा, सुशील राठी, अमित आर्य आदि मौजूद थे।

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