रोहतक के असिस्टेंट प्रोफेसरों ने बनाया स्मार्ट सिटी का मॉडल, ऐसे बचाएगा कोरोना जैसी महामारी और त्रासदी से

रोहतक के पीएलसी सुपवा के दो असिस्टेंट प्रोफेसरों की अनोखी खोज। स्मार्ट सिटी का मॉडल कोरोना जैसी महामारी और त्रासदी से बचाने में सक्षम होगा। 100 से ज्यादा जिलों के कोरोना संक्रमण केस का अध्ययन कर यह मॉडल तैयार किया है।

Umesh KdhyaniMon, 26 Jul 2021 05:56 PM (IST)
स्मार्ट सिटी मॉडल बनाने वाले असिस्टेंट प्रोफेसर मीत फतेवार और वैशाली।

केएस मोबिन, रोहतक। स्मार्ट सिटी। ऐसा क्षेत्र जहां का रहन-सहन खास हो। समस्याओं से ज्यादा समाधान पर प्रशासनिक अमले का ध्यान हो। कोई त्रासदी आए तो प्रो-एक्टिव अप्रोच हो। दुनिया के कई विकसित देश जोकि अपने अर्बन रेजिडेंश के स्मार्ट होने का दावा करते हैं, कोविड-19 महामारी में एक तरह से एक्सपोज हो गए। ऐसे में भारत जैसे विकासशील देश जिसमें स्मार्ट सिटी का स्वप्न देखा जा रहा है। हम किस मॉडल पर आगे बढ़ें। पंडित लख्मीचंद यूनिवर्सिटी आफ परफॉर्मिंग एंड विजुअल आर्ट (पीएलसी सुपवा) के असिस्टेंट प्रोफसर मीत फतेवार और वैशाली ने बड़ी आबादी की जरूरतों को देखते हुए एक सस्टेनेबल (सतत) स्मार्ट सिटी मॉडल पेश किया है।

शोधकर्ता मीत और वैशाली ने बताया कि स्मार्ट सिटी के लिए डेटा मैनेजमेंट सबसे अहम पहलू है। जितना प्रिसाइज (त्रुटिहीन) डेटा होगा, बेहतर तरीकों से समस्याओं का निदान किया जा सकेगा। कोविड-19 जैसी बीमारी देखते ही देखते महामारी में तब्दील हो गई, यह डेटा और इंफॉर्मेशन के मिस मैनेजमेंट के कारण हुआ। विकसित देश फ्रांस, अमेरिका व अन्य जोकि खुद के अर्बन सेटलमेंट के स्मार्ट होने का दावा करते आए हैं, कोविड-19 के दौर में एक्सपोज हो गए हैं। इसका कारण किसी सिटी को इकोनॉमिक बेस (आधार) पर स्मार्ट सिटी का दर्जा देना रहा। जबकि, इन्वायरनमेंटल (पर्यावरणीय) चुनौतियों को हमेशा से अनदेखा किया जा रहा है। शोधकर्ताओं का कहना है कि पापुलेशन डेनसिटी (जनसंख्या घनत्व) और कोरोना की सिवेरिटी (गंभीरता) को देखते हुए डेटा आधारित डिजिटल माडल तैयार किया है। वैक्सीनेशन में यह मॉडल इस्तेमाल किया जाए तो बेहतर नतीजे मिल सकते हैं।

स्मार्ट सिटी मिशन के 100 शहरों का डेटा किया एकत्र

पीएलसी सुपवा में बतौर गेस्ट फैकल्टी कार्यरत मीत फतेवार और वैशाली ने स्मार्ट सिटी मिशन (एससीएम) के 100 शहरों में कोविड-19 की गंभीरता की पड़ताल की। एसीएम के 49 शहर जोकि छह शहर, तमिलनाडू, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और गुजरात में हैं। जिले को यूनिट मानते हुए कोरोना संक्रमण के डेटा का विश्लेषण किया। 11 जनवरी से 17 जुलाई तक करीब 27 सप्ताह के कोविड-19 डेटा के एकत्र किया।

डेटा के पांच लेवल बनाए, इसे जीआइएस सॉफ्टवेयर से जोड़ा

शोधार्थियों ने पर्सनल और नान-पर्सनल डेटा को पांच लेवल में विभाजित किया। लेवल-1 में पब्लिक यूज के लिए टेस्टेड, कंफर्ड, एक्टिव, रिकवर्ड व डिसिजड डेटा को रखा। लेवल-2 में इंटर्नल यूज के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं, बेड संख्या व स्वास्थ्य कर्मचारियों की जानकारी रखी। लेवल-3 में सेंसेटिव डेटा को स्टोर किया, जैसे नाम, पता, आधार नंबर, बैंक, पैन कार्ड, वोटर आइडी। लेवल-4 में प्रोटेक्टेड डेटा मेडिकल रिपोर्ट, बायोमिट्रिक, पुलिस रिकार्ड। लेवल-5 में रिस्ट्रिक्टेड डेटा जैसे ट्रेवलिंग हिस्ट्री, लोकेशन, ट्रेकिंग को रखा। पांचों लेवल के डेटा को जीआइएस (जियोग्राफिक इंफोर्मेशन सिस्टम) से जोड़ा।

पॉपुलेशन की ऑन टाइम मॉनिटरिंग से होंगे समाधान

पांचों लेवल का डेटा जीएसआइ से जुड़ने पर रियल टाइल मानिटरिंग हो पाएगी। शोधार्थी कहते हैं कि अर्बन डेवलपमेंट की बजाए रिजनल डेवलपमेंट की बात करनी होगी। पूरे जिले को एक यूनिट मानकर रूरल और अर्बन डेमोग्राफ को सुरक्षित करना होगा। डिजिटल मॉडल से हर पल यह पता लगाया जा सकेगा कि किस क्षेत्र में किस तरह की एक्टिविटी हो रही है। जैसे यदि माडल में सही डेटा स्टोर हो तो एक क्षण में किसी भी व्यक्ति का स्टेटस पता लगाया जा सकता है। जीआइएस से जुड़ा डेटा ऑन टाइम पॉपुलेशन की हेल्थ या अन्य तरह की मानिटरिंग करेगा। इससे किसी भी समस्या से निपटने के लिए प्रो एक्टिव अप्रोच प्रशासन अपना सकेगा।

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