Jhajjar: देश को जगमग करने वाले दीयों पर बरसात का ग्रहण, बढ़ी कीमत, व्यापारियों ने देरी से किया आर्डर

दीये बनाने के लिए साफ मौसम की आवश्यकता होती है। लेकिन जुलाई के बाद से ही बरसात का सिलसिला जारी है। जिस कारण कारीगरों का काम प्रभावित हुआ। कई कारीगरों के तो बनाए हुए कच्चे दीये भी बरसात के कारण खराब हो गए।

Naveen DalalSat, 16 Oct 2021 05:27 PM (IST)
एक हजार दीयों की कीमत 450 रुपये तक बढ़ गई।

जागरण संवाददाता,झज्जर। देशभर के विभिन्न प्रदेशों को दीपावली पर जगमग करने वाले दीयों पर इस बार बरसात का ग्रहण लग गया। जहां महाराष्ट्र पंजाब, गुजरात, दिल्ली व हरियाणा सहित अन्य प्रदेशों में झज्जर के दीये अपनी अलग ही पहचान बनाए हुए हैं। लगभग हर दीपावली पर इन प्रदेशों को झज्जर के दीये जगमग करते थे। लेकिन इस बार केवल महाराष्ट्र व गुजरात ही झज्जर के दीयों से जगमग होंगे। इसका एक कारण बरसात को माना जा रहा है तो दूसरा कारण कोरोना का डर भी रहा। जहां बरसात के कारण कारीगर दीये नहीं बना पाए, तो दूसरी तरफ व्यापारियों ने भी कोरोना की तीसरी लहर के डर से आर्डर भी देरी से दिए। जिसका असर यह हुआ कि मांग के अनुरूप झज्जर में दीये भी उपलब्ध नहीं हुए।

100 कारीगर दीये बनाने का काम करते हैं

झज्जर के दीये के नाम से अब ब्रांड बनता जा रहा है। जिसकी विभिन्न प्रदेशों में अलग पहचान है। वहां लोग झज्जर के दीये के नाम से काफी खरीददारी करते हैं। इसलिए वहां के व्यापारी भी झज्जर के दीयों को प्राथमिकता देते हैं। जिले की बात करें तो करीब 100 कारीगर दीये बनाने का काम करते हैं। सामान्यत: झज्जर जिले से हर वर्ष दीपावली पर करीब दो से ढाई करोड़ दीये विभिन्न प्रदेशों में सप्लाई होते थे। कोरोना महामारी की दस्तक के बाद दीये की मांग में गिरावट आई और सप्लाई भी प्रभावित हुई। जिस कारण पिछले वर्ष बड़ी मुश्किल से करीब 20 लाख दीये ही सप्लाई हुए। वहीं इस बार की बात करें तो अब तक जिले से 40 लाख दीये सप्लाई हो चुके हैं। अभी करीब सप्ताहभर या दस दिनों तक दीये और भी सप्लाई किए जाएंगे। वहीं व्यापारियों द्वारा दीयों की मांग भेजी गई है, जिसे पूरी करने का कारीगर प्रयास कर रहे हैं। लेकिन इस बार मांग के अनुरूप सप्लाई नहीं हो पाई।

बरसात से कम बने दीये

दीये बनाने के लिए साफ मौसम की आवश्यकता होती है। लेकिन जुलाई के बाद से ही बरसात का सिलसिला जारी है। जिस कारण कारीगरों का काम प्रभावित हुआ। कई कारीगरों के तो बनाए हुए कच्चे दीये भी बरसात के कारण खराब हो गए। लगातार बरसात का सिलसिला जारी रहने के कारण कारीगर भी अधिक दीये नहीं बना पाए। दीपावली से करीब तीन-चार माह पहले दीये बनाने का पीक समय होता है। उस समय में बरसात के कारण कारीगर काम नहीं कर पाए। इसलिए उम्मीद अनुसार दीयों का निर्माण भी नहीं हो पाया।

व्यापारियों में आर्डर के लिए हिचकिचाहट

कोरोना महामारी की दूसरी लहर के बाद तीसरी लहर की आशंका भी जताई जा रही थी। जिसके अनुसार व्यापारियों को भी डर था कि कहीं पिछली दफा की तरह कोरोना महामारी के कारण उनके दीये ना बिक पाएं। इसलिए व्यापारी भी दीयों का आर्डर देने में हिचकिचा रहे थे। इसलिए कारीगरों ने भी बिना आर्डर के काफी कम दीयों का निर्माण करवाया। अब कोरोना महामारी काफी हद तक नियंत्रण में हैं। इसलिए व्यापारी भी दीयों की जमकर मांग कर रहे हैं। लेकिन दीयों का निर्माण नहीं होने के कारण मांग पूरी नहीं हो पा रही।

दीयों की बढ़ी कीमत

मांग अनुसार दीयों का निर्माण नहीं हो पाया इस कारण दीयों की कीमत में भी इजाफा हुआ है। जहां पहले करीब 400 रुपये एक हजार दीये व्यापारियों को थोक में बेचे जाते थे। लेकिन इस बार मांग पूर्ति नहीं होने पर दीयों की कीमत भी बढ़ गई। इस बार एक हजार दीयों की कीमत 450 रुपये तक बढ़ गई। इसके बावजूद भी दीयों की पूर्ति नहीं हो पा रही। इसलिए व्यापारियों को झज्जर से मायूसी मिल रहे हैं और व्यापारी वैकल्पिक व्यवस्था करने में जुटे हैं।

झज्जर में दीये बनाने के लिहाज से अच्छी मिट्टी है। इसलिए झज्जर के दीयों की मांग रहती है। वे भी करीब चार-पांच माह पहले ही दीये बनाने में जुट गए थे। इस बार पिछले वर्ष के मुकाबले दीयों की मांग भी बढ़ी है। दीयों में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी की बात करें तो लगभग अधिकतर कारीगर गांव पाहसौर से लेकर आते हैं। वहां की मिट्टी से दीये अच्छे व साफ बनते हैं।

झज्जर के राष्ट्रपति अवार्डी कारीगर इंद्रपाल खोहाल के अनुसार

इस बार बारिश के कारण काफी कम दीये बने हैं। वहीं व्यापारियों ने भी देरी से आर्डर दिए। इसलिए अब दीयों की मांग काफी आई हुई है, लेकिन मांग की पूर्ति के लिए दीये उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इस बार केवल गुजरात व महाराष्ट्र में ही दीये सप्लाई किए गए हैं।

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