Artificial Insemination: अब बकरियों का भी कराया जाएगा कृत्रिम गर्भाधान, केंद्रीय भेड़ प्रजनन फार्म में किया गया AI तकनीक का प्रयोग

केंद्रीय भेड़ प्रजनन फार्म में 50 बकरियों पर ट्रायल के रूप में एआइ तकनीक का प्रयोग किया उनके बच्चे हृष्टपुष्ट हैं। वहीं सामान्य बकरी एक दिन में 800 ग्राम दूध देती है वहीं एआइ तकनीक से उत्पन्न बकरी 1.5 लीटर दूध प्रतिदिन दे रही है।

Naveen DalalMon, 13 Sep 2021 07:28 PM (IST)
केंद्रीय भेड़ प्रजनन फार्म में किया गया एआइ तकनीक का प्रयोग।

हिसार, जागरण संवाददाता। अभी तक गाय और भैंसों में कृत्रिम गर्भाधान (आर्टिफिशियल इनसेमिनेशन) तकनिकी का प्रयोग गर्भधारण के लिए किया जाता रहा है, लेकिन अब बकरियों का भी कत्रिम गर्भाधान कराया जा रहा है। कुछ समय पहले ही केंद्रीय भेड़ प्रजनन फार्म में एआइ तकनीक का प्रयोग बकरियों पर किया गया था। इसके सकारात्मक परिणाम आए हैं।

एक अच्छे नस्ल के बकरे से 100-100 बकरियों का गर्भाधान कराया जा सकता है और अच्छे नस्ल के बकरियां पैदा की जा सकती हैैं। अभी तक जो बकरे-बकरियां कृत्रिम गर्भाधान से पैदा हुई हैैं, उन सबकी सेहत अच्छी है, वह दूध भी अच्छा दे रही हैं और उनका वजन भी अच्छा है। कृत्रिम गर्भाधान का फायदा यह होगा कि अच्छी नस्ल और अधिक वजन के बकरे बकरियां पैदा होंगे और उनमें मांस भी अधिक होगा। गौरतलब है कि निर्बल वर्ग के लिए बकरी पालन एक अच्छा व्यवसाय है। कुछ ही वर्षों में बकरी पालन से अच्छी आय हो सकती है।

सामान्य बकरी और कृत्रिम गर्भाधान से उत्पन्न बकरी में अंतर

दरअसल केंद्रीय भेड़ प्रजनन फार्म में 50 बकरियों पर ट्रायल के रूप में एआइ तकनीक का प्रयोग किया, उनके बच्चे हृष्टपुष्ट हैं। वहीं सामान्य बकरी एक दिन में 800 ग्राम दूध देती है वहीं एआइ तकनीक से उत्पन्न बकरी 1.5 लीटर दूध प्रतिदिन दे रही है। साथ ही बकरी के बच्चे का वजन डेढ़ किलोग्राम का होता है वहीं एआइ तकनीक से उत्पन्न बकरी या बकरे में तीन किलोग्राम तक वजन होता है।

बकरी के दूध में होता है चार फीसद प्रोटीन

बकरी पालन ग्रामीण बेरोजगारों के लिए रोजगार का अच्छा साधन है। इसका दूध सुपाच्य व पौष्टिक होता है। इसमें चार फीसद प्रोटीन होता है। वसा की मात्रा कम होने से देश में बकरियों की नस्लें देश में बकरियों की 26 प्रकार की नस्लें हैं। जिसमें गद्दी, चियांगथागी, चेगू, सिरोही, मारवाड़ी, जखराना, बीटल, बरबरी, जमुनापारी, मेहसाना, गोहिलवाड़ी, झालावाड़ी, कच्छी, सूरती, संगमनेरी, उस्मानावादी, मालावारी, गंजम, बंगाल, कनी आडू, टेरेसा, कोडी आडू, अट्टा पाड़ी, कोंकानयाल, बेरारी, पंतजा प्रमुख रूप से शामिल हैं।

केंद्रीय भेड प्रजनन फार्म के निदेशक डा एके मल्होत्रा ने बताया कि हमने एक वर्ष पहले (आर्टिफिशियल इनसेमिनेशन) का प्रयोग बकरियों पर किया था। जिसका उद्देश्य था कि नस्ल सुधार के कार्य किए जा सके। अब इसके परिणाम हमें मिले हैं। सभी परिणाम सकारात्मक रहे हैं। जल्द ही अच्छी नस्ल की बकरियां हम दे सकेंगे।

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