किसान आंदोलन : पं बंगाल की दुष्‍कर्म पीडि़ता ने पिता से सिसकते हुए कहा था, मेरे साथ गलत हुआ

किसान आंदोलन में शामिल होने आई पश्चिम बंगाल की युवती ने मरने से पहले अपने पिता को आपबीती बताई थी

पश्चिम बंगाल की युवती से पहले ट्रेन में छेड़छाड़ और फिर आंदोलन में बने तंबू में उसके साथ दरिंदगी हुई। अपनी पीड़ा बताने की कोशिश करती है मगर डरी सहमी रहती है। पिता को आखिरी बार इतना ही कह पाती है कि....मेरे साथ गलत हुआ है।

Manoj KumarMon, 10 May 2021 12:59 PM (IST)

बहादुरगढ़, जेएनएन। पश्चिम बंगाल के चुनाव में किसानी का मुखौटा पहनकर गए जिन लोगों को पश्चिम बंगाल की युवती किसान-मजदूर का हमदर्द मानकर उनके साथ अकेली चल पड़ थी, उन्होंने पहले ट्रेन में छेड़छाड़ और फिर आंदोलन में बने तंबू में उसके साथ दरिंदगी। अपनी पीड़ा बताने की कोशिश करती है मगर डरी सहमी रहती है। परिवार को आपबीती सुनाती है, मगर आंदोलन के बीच मुंह नहीं खोल पाती। पिता को आखिरी बार इतना ही कह पाती है कि....मेरे साथ गलत हुआ है। अब युवती दुनिया में नहीं है, मगर अपने पीछे बहुत सारे सवाल छोड़ गई है। किसान आंदोलन में टिकरी बॉर्डर पर आई युवती से दुष्‍कर्म होने और फिर कोरोना संक्रमित होने के बाद उसकी मौत होने के पूरे प्रकरण को समझने के लिए पढ़े पूरी खबर.......

आइए सिलसिलेवार सारे प्रकरण पर नजर डालते हैं

एक अप्रैल : टीकरी बार्डर से किसान सोशल आर्मी से जुड़े अनूप चानौत, अनिल मलिक के अलावा अंकुर सांगवान, जगदीश बराड़ और कविता आर्य व योगिता सिहाग पश्चिम बंगाल के चुनाव में भाजपा के खिलाफ प्रचार के लिए जाते हैं।

दो अप्रैल : बंगाल के चंदन नगर व सिरसामपुर में प्रचार के दौरान इन सभी छह आरोपितों की मुलाकात पीडि़त युवती से होती है। पीडि़ता भी उनके साथ आंदोलन में शामिल होने की इच्छा जताती है। सभी उसको साथ लेकर आने की बात कहते हैं।

11 अप्रैल : सभी छह आरोपितों के साथ पीडि़ता ट्रेन से रवाना होती है। मगर उसके साथ ट्रेन के अंदर ही छेड़छाड़ हो जाती है। इससे वह अंदर से टूट जाती है, घबरा जाती है। फिर भी इस दर्द को भुला 12 अप्रैल को यहां पहुंचती है।

14 अप्रैल : युवती अपने पिता से बात करती है। ट्रेन की घटना सुनाती है। वह बताती है कि अनिल मलिक ने उसके साथ क्या किया। पिता भी सुनकर हैरान हो जाते हैं। उसकी मदद के लिए आने की बात कहते हैं।

16 अप्रैल : युवती को रक्तस्राव होता है। इससे वह घबरा जाती है। वह समझ जाती है कि उसके साथ गलत हो चुका है। मगर उसे कुछ सूझ नहीं पाता। वह पूरा दिन बेचैनी और चिंता में बिताती है। उसे दूसरे तंबू में महिलाओं के पास ले जाया जाता है।

17 अप्रैल : आरोपितों में से एक महिला वालंटियर उसकी वीडियो क्लिप बनाती है। इसमें पीडि़ता अपनी आपबीती सुनाती है। मगर इसकी पुलिस तक सूचना नहीं दी जाती।

18 अप्रैल : पीडि़त युवती कुछ मददगारों के साथ एक अधिवक्ता के पास जाती है। उससे सलाह लेते हैं कि क्या करना चाहिए। इसमें दो दिन बीत जाते हैं। आंदोलनकारियों में यह बात फैलने लगती है। फिर युवती अपने पिता को कहती है कि वह यहां पर खुश है। उसे मासिक धर्म आने के कारण रक्तस्राव हुआ था।

21 अप्रैल : युवती की हालत बिगड़ती है। उल्टी-दस्त लगते हैं। वह आंदोलन के बीच ही दवा लेकर आती है। मगर आराम नहीं होता।

24 अप्रैल : हालत और बिगड़ जाती है। उसको सांस लेने में तकलीफ होती है। उसके पिता तक बात पहुंचती। फिर दिल्ली के डा. अमित वत्स के माध्यम से उसकी मदद होती है। वहीं से बात किसान नेता योगेंद्र यादव तक पहुंचती है। वे युवती की मेडिकल जांच कराने की बात कहते हैं।

25 अप्रैल : अनूप चानौत व अनिल मलिक युवती के पिता से बात करते हैं और उसको लेकर पश्चिम बंगाल आने की बात कहते हैं। वे मना करते हैं। फिर यह बात योगेंद्र यादव तक पहुंचती है। पीडि़ता बोल नहीं पा रही थी। योगेंद्र यादव ने आरोपितों से संपर्क किया। पूछा कहा हों, तो बताया आगरा जा चुके हैं। इस पर योगेंद्र यादव ने मोबाइल पर लोकेशन भेजने के लिए कहा। जब लोकेशन भेजी गई तो वह हांसी की मिली। इस पर योगेंद्र यादव ने भी चेतावनी दी कि युवती को लेकर वापस आ जाओ, अस्पताल में भर्ती करवाओ, वरना पुलिस कार्रवाई होगी।

26 अप्रैल : युवती को रोहतक पीजीआइ ले जाया जाता है। मगर बेड नहीं मिलता। बाद में युवती को बहादुरगढ़ के शिवम आरआर अस्पताल में उसे टीम दीपेंद्र सिंह हुड्डा के सदस्य की मदद से भर्ती कराया गया, जहां पर उसका कोरोना इलाज शुरू होता है। डा. अमित वत्स को सूचना दी गई। इसके बाद युवती के पिता भी यहां पहुंचते हैं। तब तक उसकी हालत बिगड़ चुकी थी।  

27 अप्रैल : युवती के पिता अपनी बेटी के साथ हुई घटना का पता लगाते हैं। मालूम होता है कि उनकी बेटी के साथ ट्रेन में तो छेड़छाड़ हुई लेकिन किसान सोशल आर्मी के तंबू में सामूहिक दुष्कर्म हुआ। मगर पुलिस को शिकायत नहीं दी जाती।

29 अप्रैल : पुलिस भी अपने स्तर पर जांच के लिए अस्पताल पहुंचती है, मगर कोई भी आगे नहीं आता। आखिरी बार पिता की अपनी बेटी से मुलाकात होती है। वह कहती है...हमारे साथ गलत काम हुआ है। जिन लोगों ने किया है, वे बचने नहीं चाहिए। मगर आंदोलन पर दाग नहीं लगना चाहिए। वह बताती है कि 11 से 16 अप्रैल तक उसके साथ गलत हुआ। मगर वह डरी-सहमी सब कुछ न बता पाई।

30 अप्रैल : युवती की मौत हो जाती है। अपनी इकलौती बेटी खो देने के बाद पिता टूट जाते हैं। किसी तरह उन्हेंं बेटी के अंतिम संस्कार की इजाजत मिलती है। बहादुरगढ़ में ही अंतिम संस्कार किया जाता है। अगले दिन वे अस्थियां लेकर टीकरी बार्डर पर पहुंचते हैं, मगर उनकी बेटी के साथ हुई घटना पर कुछ नहीं बोल पाते। बाद में अपनी पत्नी के साथ दोबारा आंदोलन में आते हैं। यहां संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं से मिलते हैं। मोर्चा के नेता उनके साथ खड़े होने का विश्वास दिलाते हैं तब उनमें हिम्मत बनती है। इस बीच टीकरी बार्डर पर आरोपितों के तंबू उखाड़े जाते हैं।

आठ मई: टीकरी बॉर्डर पर संयुक्त किसान मोर्चा की गुप्त बैठक होती है। उसके बाद युवती के पिता शिकायत दर्ज कराते हैं। शहर थाना पुलिस केस दर्ज करके महिला थाना प्रभारी को जांच सौंपती है।

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