Kisan andolan: टीकरी बॉर्डर पर सूनापन, जो किसान वापस गए अब लौट नहीं रहे, मंच से हो रहा आह्वान

बहादुरगढ़ में लगभग 15 किलोमीटर तक आंदोलनकारी फैले हुए हैं। टीकरी बॉर्डर से लेकर बाईपास के आखिरी छोर तक तंबू लगाए गए थे। अब इनमें से बीच-बीच में अनेक तंबू खाली नजर आते हैं। आखिरी छोर पर तो अब इक्का-दुक्का ही तंबू रह गए हैं।

Umesh KdhyaniSat, 24 Jul 2021 04:59 PM (IST)
बहादुरगढ़ में किसान आंदोलन स्थल का आखिरी छोर।

जागरण संवाददाता, बहादुरगढ़। कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन को आठ माह पूरे होने में एक दिन शेष है। कई उतार-चढ़ावों से गुजरे इस आंदोलन में अब जोश की जगह सूनापन ही दिखता है। टीकरी बॉर्डर पर दो जगह सभाएं तो चलती हैं, लेकिन हाजिरी अब घट चुकी है। जो किसान आंदोलन से वापस गए, उनमें से अधिकतर दोबारा यहां पर वापस नहीं लौट रहे हैं। रोजाना उनको बुलाने के लिए मंच से आह्वान होता है।

आंदोलन के आखिरी छोर पर तो अब इक्का-दुक्का ही तंबू रह गए हैं। दरअसल, बहादुरगढ़ में लगभग 15 किलोमीटर तक आंदोलनकारी फैले हुए हैं। टीकरी बॉर्डर से लेकर बाईपास के आखिरी छोर तक तंबू लगाए गए थे। अब इनमें से बीच-बीच में अनेक तंबू खाली नजर आते हैं। जिन तंबुओं में आंदोलनकारी हैं, वहां पर संख्या अब पहले के मुकाबले आधे से भी कम है। यही वजह है कि अब आंदोलन में सूनापन छाया रहता है। कहने की बात नहीं कि आठ माह में आंदोलनकारी भी थक चुके हैं। भले ही इसे वे अपने मुख से बयां न करें। आखिर इसी वजह से तो आंदोलन छोर पर अब पहले जितने तंबू नहीं हैं।

बरसात के दौर में आसान नहीं तंबू में ठहरना

आखिरी छोर भी पहले जहां तक था, अब उस प्वाइंट तक नहीं है। जबसे बरसात का दौर शुरू हुआ है, तब से तंबुओं में ठहरना भी आसान नहीं। पिछले दिनों कुछ कच्चे तंबू तूफान में गिर गए। उन्हें आंदोलनकारी छोड़ गए। नेशनल हाईवे-9 के जाखौदा मोड़ के पास यह स्थिति बनी है।

मंचों से रोजाना होता है आह्वान, किसानों को गांवों से बुलाओ

टीकरी बार्डर पर रोजाना सभा तो चलती है, मगर यहां पर हाजिरी पहले के मुकाबले आधी भी नहीं। यह स्थिति मंच पर मौजूद रहने वाले किसान नेताओं और वक्ताओं को भी असहज करती है। इसीलिए कई वक्ता बार-बार यह आह्वान करते सुने जा सकते हैं कि जो गांवों में किसान हैं, उनको बार्डर पर बुलाओ। साथ ही जो अपने तंबुओं में रहते हैं और सभा स्थल पर नहीं आते, वे भी नियमित रूप से उपस्थिति दर्ज कराएं ताकि आंदोलन कमजोर न पड़े।

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