स्वच्छ दूध पाना है तो डेयरी व्यवसायियों को यह करने होंगे उपाय, होगा बड़ा फायदा

साधारण अवस्था में दूध के तरल पदार्थ होने की वजह से दूध में जीवाणुओं से संक्रमण की संभावनाएं बनी रहती हैं। इसलिए दूध एक अति संवेदनशील खाद्य पदार्थ है जिसकी स्वतः आयु बहुत कम है। जीवाणु बड़ी जल्दी इसको संक्रमित कर सेवन के लिए अयोग्य कर देते हैं।

Manoj KumarSun, 05 Dec 2021 11:58 AM (IST)
दूध में मिलावट जैसी अनेक परिस्थितियां दुग्ध उत्पादन की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं।

जागरण संवाददाता, हिसार। मनुष्य के लिए दूध एक आदर्श एवं संपूर्ण खाद्य पदार्थ हैं। इसमें प्रोटीन, वसा, शक्कर तथा कई प्रकार के लवण पाये जाते हैं। भारत में लगभग दो-तिहाई दुग्ध उत्पादन छोटे एवं गरीब किसानों द्वारा होता हैं। भारत दुग्ध उत्पादन में दुनिया के सभी देषों में सर्वोपरि हैं, फिर भी यहां पर मौजूदा दुग्ध उत्पादन छोटी-छोटी इकाईयाें में असंघठित हैं। लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय पशु अनुवांशिकी एवं प्रजनन विभाग के विज्ञानियों की मानें तो भारत में उष्णकटिबंधीय जलवायु का होना, किसानों में गुणवत्ता चेतना की कमी एवं बड़े पैमाने पर दूध में मिलावट जैसी अनेक परिस्थितियां दुग्ध उत्पादन की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं।

साधारण अवस्था में दूध के तरल पदार्थ होने की वजह से, दूध में जीवाणुओं से संक्रमण की संभावनाएं बनी रहती हैं। इसलिए दूध एक अति संवेदनशील खाद्य पदार्थ है, जिसकी स्वतः आयु बहुत कम है। जीवाणु बड़ी जल्दी इसको संक्रमित कर सेवन के लिए अयोग्य कर देते हैं। जिससे न केवल दूध की गुणवत्ता खराब होती है बल्कि दुग्ध उत्पादन पर भी असर पड़ता है। स्वच्छ दुग्ध का मतलब स्वच्छ दूध स्वच्छ दुधारू पशु के थन से निकला वो प्राकृतिक द्रव्य पदार्थ है जिसमें कोई बाह्य गन्दगी नहीं होती और स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छी सुगंध एवं पौष्टिकता वाला होता हैं। इसके रख-रखाव के गुण भी अधिक होते हैं एवं इसमें निर्धारित प्रतिषत मात्रा में वसा व ठोसपदार्थ विद्यमान होते हैं।

स्वच्छ दुग्ध उत्पादन के उद्देश्य

1. दूध को दृष्टिगोचर गन्दगी रहित प्राप्त करना।

2. हानिकारक जीवाणु रहित दुग्ध उत्पादन करना।

3. अच्छी सुगंध, रख-रखाव एवं स्वाद वाला दूध प्राप्त करना।

4. अच्छे दूध पदार्थ बनाने के लिए।

5. अस्वच्छ दूध से फैलने वाली बीमारियों की रोकथाम के लिए।

दुग्ध संक्रमण होने के मुख्य कारण एवं उनका निदान दूध को संक्रमित करने के मुख्यतः दो कारण हैं

आन्तरिक कारण- रोग ग्रसित पशु जैसे थनैला रोग, टीबी, चेचक, तरंगित बुखार, मिल्कसिकनेस इत्यादि। बचाव यदि पशु थनैला रोग से ग्रसित हैं तो उसका दूध मनुष्य के प्रयोग में न लायें तथा उसे फेंक दें। थनैला संभावित एवं ग्रसित पशु को हमेषा अंत में दुहें। प्रथम दूध की कुछ धार स्ट्रिप कप में डालकर या फिर होटस एवं कैलिफोर्नियन परीक्षण द्वारा जांच लें। अगर दुधारू पशु किसी बीमारी से ग्रसित हैं तो, उसे पशु चिकित्सक के पास ले जाकर उसका पूर्ण इलाज करवाएं। दुधारूपशुओं का समय रहते टीकाकरण अवष्य करवाएं।

बाह्य कारण :

- दूध का दुधारू पशु द्वारा संक्रमण होना जैसे मलमूत्र द्वारा, त्वचा एवं अयन पर गन्दगी से।

बचाव ---

पशु को दोहन से एक घंटा पहले ब्रुश करें, इससे ढ़ीले बाल एवं त्वचा के सूखे चीथड़े दूध दोहने से पहले झड़ जाते हैं। दोहने के समय पूंछ को पिछले पैरों से बांध लें। थनों को दोहने से पहले धो लें, उसके बाद उस पर कीटनाषक घोल (2 प्रतिशत बेन्जितोल) या लाल दवा लगाक रसूखे कपड़े से पोछ लें। दूध दोहने के समय ये अवश्य सुनिश्चित कर लें कि थन अच्छी तरह से सूखे हुए हों।

मनुष्य द्वारा संक्रमण-

मनुष्य की कुछ बीमारियां जैसे (टाइफाइड, दस्त, कोलेरा, डिप्थेरिया)भी दूध को संक्रमित करती हैं।

बचाव----

स्वस्थ व्यक्ति ही दुधारू पशुओं का दूध निकालें, साथ-साथ ये भी सुनिश्चित करें कि उसके नाखून बराबर कटे हो, हाथ साफ हों एवं उसमें बुरी आदतें न हों (जैसे-सिगरेट पीना, पान गुटकाआदि चबाना। दोहनें से पहले हाथों को 20 पीपीएम क्लोरीन घोल से अवश्य धोएं।

दूध का किसी भी माध्यम से संक्रमण-जैसे बर्तन, दुग्धशाला, दोहने का ढंग, चारा इत्यादि।

बचाव

बर्तन साफ, जीवाणु रहित, स्टील के एवं कम जोड़ों के हों, प्रयोग करने से पहले क्लोरीन से धुले हुएं और सुखें हों। दुग्धशाला की दीवारों पर सफेदी पुती हुई हो, फर्ष साफ हो, साथ-साथ पशुशाला में हवाके आगमन एवं रोशनी का उचित प्रबंध हो। दुधारू पशु को हमेषा पूर्ण हस्त द्वारा ही दोहें, इससे न केवल पूर्ण दोहन होता हैं बल्कि पशु को दोहते समय तकलीफ भी नहीं होती।

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