Hisar News: पराली को खत्म करना है तो खेत को दें कैप्सूल, सरकार ने 25 राज्यों के किसानों को दी कैप्सूल किट

पराली को खाद में बदलने के लिए पूसा इंस्टीट्यूट ने कुछ समय पहले एक बायो डीकंपोजर तैयार किया। पहले इसका प्रयोग दिल्ली के किसानों के साथ किया गया। इसके बाद अब हरियाणा सहित अन्य राज्यों में भी यह प्रयोग हो रहा है।

Naveen DalalMon, 27 Sep 2021 12:56 PM (IST)
पराली जलाने वाले किसानों खेत दें सकते हैं कैप्सूल।

हिसार, जागरण संवाददाता। पराली को अगर फायदेमंद बनाना है तो किसानों को अपने खेतों को एक विशेष कैप्सूल देने की आवश्यकता है। पूसा द्वारा तैयार किया गया डीकंपोजर धान के अवशेष को जैविक खाद में बदल रहा है। दरअसल देश भर में फसल अवशेष प्रबंधन के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) द्वारा डीकंपोजर तकनीकि पर आधारित कैप्सूल बनाया है।

इस कैप्सूल को देशभर में पहुंचाने के लिए प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के विज्ञानी प्रगतिशील किसानों के साथ पूसा डीकंपोजर का धान के भूसे के अपघटन का आंकलन करने के लिए एक फील्ड विजिट भी पूर्व में कर चुके हैं। आईएआरआई ने पूसा डीकंपोजर के बड़े पैमाने पर मार्केटिंग और उत्पादन के लिए 12 कंपनियों को इस तकनीक का लाइसेंस दिया है। इसके किसानों के उपयोग के लिए अपनी सुविधा से पूसा डीकंपोजर के लगभग 20 हजार पैकेट तैयार किए हैं।

क्या है पूसा डीकंपोजर

पराली को खाद में बदलने के लिए पूसा इंस्टीट्यूट ने कुछ समय पहले एक बायो डीकंपोजर तैयार किया। पहले इसका प्रयोग दिल्ली के किसानों के साथ किया गया। इसके बाद अब हरियाणा सहित अन्य राज्यों में भी यह प्रयोग हो रहा है। पहले विज्ञानियों ने 20 रुपये में चार पैकेट उपलब्ध कराए थे। चार कैप्सूल से 25 लीटर घोल बनाया जाता है। इसके बाद एक एकड़ में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

यह है इस घोल का बनाने की विधि

सबसे पहले पांच लीटर पानी में 100 ग्राम गुड़ उबाला जाता है। इसके ठंडे होने के बाद घोल में 50 ग्राम बेसन मिलाकर कैप्सूल को मिलाया जाता है। इसके बाद घोल को 10 से 12 दिन तक अंधेरे कमरे में रखना होता है। इसके बाद घोल तैयार हो जाता है और उसे पराली पर किसान स्प्रै कर सकते हैं। घोल छिड़कने के लिए 20 दिन के भीतर पराली गलनी शुरू हो जाती है। इसके बाद किसान फसल की बुबाई कर सकते हैं। कुछ समय बाद यह पराली गलकर खाद में बदल जाती है और फसल को ही फायदा पहुंचाने लगती है। इसके साथ ही मिट्टी में पोषक तत्व भी सही रहते हैं।

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