किसान आंदोलन : कहीं दूध का इंतजार, तो कहीं पसरा है सन्नाटा, आंदोलन लंबा खींचने की जद्​दोजहद

आंदोलन का अब उतार चल रहा है लेकिन इसे लंबा खींचने की जद्दोजहद जारी है। यहां पर तमाम व्यवस्थाएं बदल गई हैं। अब पहले जैसा कुछ भी नहीं है। अब तो यहां पर कहीं दूध का इंतजार होता है तो कहीं सन्नाटा पसरा रहता है।

Manoj KumarThu, 05 Aug 2021 08:22 AM (IST)
सुविधाओं के अभाव में अब आंदोलन चलाने के लिए दिक्‍कतें बढ़ती जा रही हैं

जागरण संवाददाता, बहादुरगढ़ : तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे आंदोलन का अब उतार चल रहा है, लेकिन इसे लंबा खींचने की जद्दोजहद जारी है। यहां पर तमाम व्यवस्थाएं बदल गई हैं। अब पहले जैसा कुछ भी नहीं है। अब तो यहां पर कहीं दूध का इंतजार होता है तो कहीं सन्नाटा पसरा रहता है। दोपहर के समय दिल्ली-रोहतक रोड पर बड़ी संख्या में आंदोलनकारियों को हाथों में बर्तन लिए और लंबी लाइन लगाए दूध की गाड़ी का इंतजार करते देखा जा सकता है।

काफी इंतजार के बाद जब यहां पर दूध की गाड़ी पहुंचती है तो आंदोलनकारियों को मुश्किल से इतना दूध भी नहीं मिल पाता कि दिन भर में कई बार चाय बन सके। यह हाल तब है जब यहां पर आंदोलनकारियों की संख्या पहले के मुकाबले 30 फीसद ही है। अगर संख्या पहले जितनी हो तो शायद यहां पर हर चीज के लिए आंदोलनकारियों को दिन भर इंतजार ही करना पड़े। अब आस-पास के गांवों से दूध-लस्सी कि वह मदद नहीं हो रही है। कोरोना की दूसरी लहर के बाद इस तरह के मददगार ठिठक गए हैं।

जिन-जिन गांवों की आंदोलन स्थल पर ज्यादा सक्रियता रही, उन गांवों में कोरोना की दूसरी लहर में मौत का आंकड़ा ज्यादा रहा। यह अलग बात है कि आंदोलनरियों द्वारा यहां से गांवों में कोरोना न फैलने की बात कही गई, लेकिन सवाल यही है कि जिन गांवों की आंदोलन में भागीदारी ज्यादा थी, उन्हीं में केस ज्यादा क्याें सामने आए। अब तीसरी लहर का अनुमान लगाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि तीसरी लहर इसी महीने दस्तक दे सकती हैं। हालांकि इस बार कोरोना से बचाव को लेकर आंदोलन स्थल पर कुछ एहतियात जरूर देखे गए हैं।

कई महीनों तक कोरोना वैक्सीन से बचते रहे आंदोलनकारियों द्वारा पिछले दिनों आंदोलन स्थल पर वैक्सीन लगवाई गई है। जबकि इससे पहले झज्जर पुलिस-प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग द्वारा खूब कोशिश की गई थी और किसानों से बाकायदा अपील करने के साथ ही यहां पर वैक्सीनेशन कैंप भी लगाए गए थे, लेकिन तब इक्का-दुक्का आंदोलनकारी ही वैक्सीनेशन के लिए तैयार हुए थे।

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