Farmer Protest: आंदोलन ने पूरे किए 11 महीने, कई विवादों और अपराधों से जुड़ा है इस संघर्ष का नाता

आंदोलन की आड़ में ही आपराधिक तत्व पिस्तौल लेकर आते रहे और लूटपाट को अंजाम देते रहे हैं। इन सभी से पहले 26 जनवरी को जो घटना दिल्ली में हुई वह तो सभी ने देखा। इन्हीं वारदातों का अंजाम हुआ।

Naveen DalalTue, 26 Oct 2021 07:44 AM (IST)
आंदोलन के बीच ही सामूहिक दुष्कर्म भी हुआ और हत्याएं भी की गई।

जागरण संवाददाता, बहादुरगढ़। कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर चल रहा आंदोलन अब 11 महीने पूरे कर चुका है। यूं तो यह संघर्ष नए कानूनाें की वापसी के लिए शुरू किया गया था, मगर इसमें तमाम उतार चढ़ाव आए। साथ ही इसका नाता विवादों और जघन्य अपराधों से भी जुड़ता रहा। आंदोलन के बीच ही सामूहिक दुष्कर्म भी हुआ और हत्याएं भी की गई।

एक समय था जब आंदोलन में पकवानों की बहार थी

आंदोलन की आड़ में ही आपराधिक तत्व पिस्तौल लेकर आते रहे और लूटपाट को अंजाम देते रहे हैं। इन सभी से पहले 26 जनवरी को जो घटना दिल्ली में हुई, वह तो सभी ने देखा। इन्हीं वारदातों का अंजाम यह हुआ कि आंदोलन बिल्कुल फीका पड़ गया। न भीड़ रही और न ही वह उबाल। एक समय था जब आंदोलन में पकवानों की बहार थी।

कहीं गुलाबजामुन, कहीं हलवा, कहीं खीर तो कहीं जलेबी पकती थी। मगर अब यहां पर मददगारों का इंतजार है। आंदोलन के बीच पंजाब की पिन्नी (मिठाई) भी खूब चलती थी। वहां के गांवों में भारी मात्रा में खोेवे से पिन्नी तैयार की जाती थी और फिर आंदोलन स्थल पर पहुंचाई जाती थी। हरियाणा के गांवों से भी कभी खीर तो कभी हलवा तैयार करके लाया जाता था। जलेबी तो कई तंबुओं में आंदोलन के बीच ही पकती थी। इन सब पकवानों के कारण आंदोलन में भीड़ भी रहती थी, मगर ये सब बीतों दिन की बात है।

लोग यहां से वापस घरों को लौट गए

अब यहां पर तंबुओं में ही सूनापन नहीं है बल्कि वे बड़े-बड़े चूल्हे भी सूने पड़े हैं, जो भी इन पकवानों के लिए दिनेे भर जलते थे। प्रदेश के गांवों से आने वाली मददगारों की टोलियां यहां पर लड्डू लेकर आती थी। मगर अब यहां पर डटे आंदोलनकारियों के तंबुओ में दो वक्त की रोटी के अलावा और किसी पकवान की खूशबू कहीं महसूस नहीं होती। जाहिर है कि ऐसे में बहुत से लोग यहां से वापस घरों को लौट गए और अब बुलाने से भी नहीं आ रहे हैं।

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