मंथन : हम बंदरों को खाना देकर बना रहे कमजोर, जंगल के लिए आत्मनिर्भर होने दें ताकि शहर में ना आएं

शिक्षा विभाग की ओर से टीचर्स के लिए दो दिवसीय विशेष आनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम।

JagranThu, 05 Aug 2021 07:09 AM (IST)
मंथन : हम बंदरों को खाना देकर बना रहे कमजोर, जंगल के लिए आत्मनिर्भर होने दें ताकि शहर में ना आएं

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शिक्षा विभाग की ओर से टीचर्स के लिए दो दिवसीय विशेष आनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित, विशेष प्रशिक्षण बैठक में पर्यावरण मुद्दे पर हुआ मंथन जागरण संवाददाता, हिसार

शिक्षा विभाग की ओर से राजकीय विद्यालयों में कार्यरत उन शिक्षकों के लिए स्पेशल कनजरवेशन एजुकेशन यानी संरक्षण शिक्षा विषय पर दो दिवसीय आनलाइन ट्रेनिग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान दूसरे राज्यों के विषय विशेषज्ञों ने अध्यापकों को ट्रेनिग दी और बताया कि किस प्रकार पर्यावरण के लिए काम किया जा सकता है। आंकड़ों के साथ तथ्यात्मक मंथन करते हुए इनवायरमेंट कनजरवेंशन एंड क्लाइमेट चेंज, एनर्जी कनजरवेशन-ग्रीन प्रोटोकोल एंड रीन्यूवेबल प्रैक्टिस एट स्कूल, स्कूलों में इफेक्टिव वेस्ट मैनेजमेंट और स्कूलों के ग्रीन आडिटिग के साथ-साथ प्रकृति में आर्किटेक्ट विषयों पर चर्चा की गई।

इस ट्रेनिग में जिला भर के टीचर्स ने भाग लिया। जिला विज्ञान विशेषज्ञ पूर्णिमा गुप्ता ने भी ट्रेनिग में भाग लिया और सभी मुद्दों पर गहनता से मंथन किया। दो दिवसीय ट्रेनिग के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि किस प्रकार प्रकृति का संरक्षण किया जा सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि शहर में बंदर आने की घटनाएं बहुत होती हैं। कई बार बंदर आक्रामक हो जाते हैं और लोगों को नुकसान पहुंचा देते हैं। लेकिन इसमें कसूर बंदरों का कतई नहीं है बल्कि मानव का है। विशेषज्ञों ने कहा कि जंगल खत्म करते जा रहे हैं जिस कारण बंदर शहर की ओर आने के लिए मजबूर हो रहे हैं। इतना ही नहीं हम बंदरों को कई बार खाना उपलब्ध करवाते हैं और सोचते हैं कि हम उनका भला कर रहे हैं। जबकि असलियल ये है कि हम बंदरों का ही नुकसान कर रहे हैं। क्योंकि बंदर आत्मनिर्भर बनने की बजाय खाना देने वाले व्यक्तियों पर ही पूरी तरह निर्भर हो जाते हैं। इसलिए हमें प्रयास करना चाहिए कि बंदरों को खाना ना दें और आत्मनिर्भर बनने में सहयोग करें। यदि खाना नहीं देंगे तो वे शहर आना छोड़ देंगे और जंगल में ही अपने लिए स्वयं खाने का प्रबंध करेंगे। इसके लिए हम जंगलों में ही फलों के पेड़ लगाएं तो बेहतर होगा। इसी प्रकार पक्षियों को भी पिजरे में नहीं रखना चाहिए। क्योंकि इससे वे भी आत्मनिर्भर नहीं बन पाते।

ग्रीन स्कूल सहित कृषि पर भी हुई चर्चा

जिला विज्ञान विशेषज्ञ पूर्णिमा गुप्ता ने बताया कि दो दिन की ट्रेनिग के दौरान कृषि से जुड़े मुद्दों पर भी मंथन किया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि सेब कश्मीर के विख्यात हैं। लेकिन एक रिसर्च में खुलासा हुआ है कि ज्यादा पैदावार के प्रयास में पेस्टीसाइड का प्रयोग किया जा रहा है। ये नुकसानदायक है। इसी प्रकार पौधारोपण को बढ़ावा देने के लिए भी विद्यार्थियों को प्रेरित करने के लिए कहा गया। स्कूलों को मिलने वाले ग्रीन अवार्ड को लेकर भी बताया गया। इसके लिए स्कूलों को सभी नियमों पर खरा उतरना पड़ेगा। स्कूल से निकलने वाले कचरे का अपने स्तर पर प्रबंध करना होगा। उन्होंने बताया कि कई बार जंगली पौधे उग जाते हैं जिन्हें नष्ट किया जाता है। लेकिन ये भी प्रकृति के लिए लाभदायक हैं। कृषि के इतिहास पर भी चर्चा हुई।

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