शौर्य गाथाः कारगिल की लड़ाई में घायल होने के बावजूद जितेंद्र ने चार घंटे तक संभाला मोर्चा, दो आतंकी मारे

जितेंद्र बताते हैं कि साथी की हालत देख जख्म की परवाह किए बगैर उन्होंने साहस बढ़ा राइफल से गोली चार घंटे तक चलाई और दो आतंकियों को मार गिराया। इसी बीच दूसरे जवान आ गए और उन्होंने आपरेशन को सफल बना उन्हें अस्पताल पहुंचाया।

Mangal YadavWed, 04 Aug 2021 04:19 PM (IST)
घायल जितेंद्र ने चार घंटे तक मोर्चा संभाल दो आतंकी मारे

सोहना (गुरुग्राम) [सतीश राघव]। पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध से लेकर कारगिल की लड़ाई में आतंकियों के खिलाफ चले आपरेशन में भोंडसी गांव के वीरों ने जान की बाजी लगाकर लड़ाई लड़ी। कई जवानों ने प्राणों का बलिदान दिया। कुछ ऐसे भी जवान रहे जिन्होंने घायल होने के बाद भी सेना के आपरेशन को सफल बनाया। इन्हीं में से एक नाम है जितेंद्र राघव का। जिन्होंने आतंकी द्वारा फेंके गए हैंड ग्रेनेड से घायल होने के बाद भी चार घंटे तक उनसे जंग लड़ी और अपनी राइफल से दो आतंकी मार गिराए थे।

जितेंद्र के पिता ओमप्रकाश सिंह सेना में थे। उनकी प्रेरणा से जितेंद्र दसवीं तक पढ़ाई के बाद सेना में भर्ती हो गए थे। 1998 में उनकी तीन राज राइफल्स में पोस्टिंग हुई और जम्मू-कश्मीर में तैनाती हुई। 19 मई 2001 को उनकी बटालियन पाकिस्तानी सीमा पर स्थित लकदीपुरा के पास घुसपैठ करने वाले आतंकियों की तलाश में लगी हुई थी। एक तरफ पहाड़ तथा दूसरी ओर नदी होने से आपरेशन कठिन था। दोपहर करीब दो बचे छिपे दस आतंकियों ने गोली चलाने के साथ-साथ हैंड ग्रेनेड फेंकना शुरू कर दिया। चार घंटे तक दोनों ओर से गोलियां चल रही थीं और गोले भी फेंके जा रहे थे। 

आतंकी पूरी तैयारी के साथ जमे थे। सेना की टुकड़ी के पास गोले कम होने लगे थे। जवानों ने कमांडेंट को बताया तो उत्तर मिला सामान भेजा जा रहा है जंग जारी रखो। मां भारती की तरफ आंख दिखाने वाले को अंतिम गोली तक मारने का प्रयास करो। यह सुनकर जितेंद्र और अन्य जवानों में जोश आ गया और राइफल से गोली चलाने लगे। चार आतंकी मार गिराए। तभी एक गोला जितेंद्र के पास गिरा। उनको गंभीर चोट लगी जबकि साथी जवान ने प्राण न्योछावर कर दिए।

जितेंद्र बताते हैं कि साथी की हालत देख जख्म की परवाह किए बगैर उन्होंने साहस बढ़ा राइफल से गोली चार घंटे तक चलाई और दो आतंकियों को मार गिराया। इसी बीच दूसरे जवान आ गए और उन्होंने आपरेशन को सफल बना उन्हें अस्पताल पहुंचाया। जितेंद्र बताते हैं कि आतंकियों को मार गिराया मगर दु:ख इस बात का रहा कि उनके एक संगी-साथी सरदार लखमिंदर को नहीं बचा सके। वह रिटायर हो चुके हैं मगर बेटे को देश सेवा में भेजने का प्रयास कर रहे हैं।

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