भुवनेश्वरी मंदिर में आने वाले दान से गोशाला चला की जा रही है गोसेवा

भुवनेश्वरी मंदिर में आने वाले दान से गोशाला चला की जा रही है गोसेवा

गाय को प्राचीन काल से ही माता का दर्जा दिया गया है लेकिन आज समाज के बदलते परिवेश में लोगों में गाय पालन का महत्व कम हो गया है। इस बदलाव के कारण अधिकतर गोवंश बेसहारा सड़कों पर ही घूमते दिखाई देते हैं।

JagranTue, 20 Apr 2021 06:34 PM (IST)

महावीर यादव, बादशाहपुर

गाय को प्राचीन काल से ही माता का दर्जा दिया गया है, लेकिन आज समाज के बदलते परिवेश में लोगों में गाय पालन का महत्व कम हो गया है। इस बदलाव के कारण अधिकतर गोवंश बेसहारा सड़कों पर ही घूमते दिखाई देते हैं। इन बेसहारा गोवंश को सहारा देने के लिए भोंडसी के भुनेश्वरी मंदिर ने एक बेहतरीन कदम उठाया। मंदिर में गोशाला बनाकर गोवंश की सेवा की जा रही है। भुनेश्वरी मंदिर की गोशाला में पल रही गायों के दूध और घी को मंदिर में आने वाले भक्तों को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। मंदिर में समय-समय पर भंडारे का आयोजन भी किया जाता है ताकि जरूरतमंद लोगों को भोजन मिल सके। अरावली की वादियों में भोंडसी क्षेत्र में भुनेश्वरी माता का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर की बनावट भी बिल्कुल एकदम अलग है। पहाड़ियों की गुफा के अंदर बना भुनेश्वरी मंदिर भोंडसी व आसपास के गांव के ही नहीं दूरदराज के भक्तों की भी आस्था का केंद्र है। 1983 में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने देश भर की यात्रा के बाद जब भोंडसी के पास अरावली की पहाड़ियों में भारत यात्रा केंद्र की स्थापना की तो इस मंदिर का महत्व और भी बढ़ गया। चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री बनने पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया। भुवनेश्वरी मंदिर में देवी के दर्शनों के लिए नवरात्र में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। मंदिर में भगवान राम, कृष्ण, परशुराम, नरसिंह अवतार, मत्स्य भगवान, वामन, वराह अवतार की बड़ी-बड़ी मूर्तियां स्थापित हैं। इसके अलावा भगवान शिव की 30 फुट ऊंची प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने जब इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। उसी समय से ही बाबा कमल दास इस मंदिर की सेवा में रह रहे हैं। मंदिर में चलाई जा रही है गोशाला

गोसेवा के प्रति भक्तों को प्रेरित करने के लिए भुनेश्वरी मंदिर में गोशाला की स्थापना की गई। इस गोशाला में इस समय करीब डेढ़ सौ गाय हैं। अधिकतर गाय दूध देने वाली हैं। इन गायों के दूध को बिक्री के लिए नहीं रखा जाता है। गाय का दूध, घी और मक्खन आदि सभी को भक्तों को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को सबसे पहले गाय की लस्सी प्रसाद में दी जाती है। कोई भी भक्त बिना लस्सी का प्रसाद लिए यहां से नहीं जाता है। मंदिर में बनी गोशाला में आसपास की बेसहारा गायों को भी लाया जाता है। बीमार गायों के लिए इस गोशाला में विशेष व्यवस्था की गई है। गोशाला के साथ साथ ही मंदिर में भंडारे का भी आयोजन किया जाता है। गाय को माता के रूप में पूजना हमारी प्राचीन संस्कृति है। गोवंश का संरक्षण करना समाज के लिए बहुत जरूरी है। गोवंश संरक्षण समस्त मानव समाज के लिए कल्याणकारी है। मंदिरों के माध्यम से समाज के हितकारी काम किए जाने चाहिए। समाज में बड़े बड़े दानवीर हैं। जो मंदिरों में काफी बड़ी संख्या में दान देते हैं। जिन मंदिरों के पास जितना भी दान आता है। मंदिर को अपने साम‌र्थ्य के अनुसार सामाजिक कार्य के प्रति समर्पित होना चाहिए। इस समर्पण भाव से ही समाज का कल्याण होगा।

- कमल दास जी महाराज, भुवनेश्वरी मंदिर भोंडसी भुनेश्वरी मंदिर में सेवा ही सेवा है। मंदिर में सेवा के अलावा कुछ नहीं है। मंदिर में आने वाले सभी भक्तों को बेहद आनंद की अनुभूति होती है। गोशाला में भक्तों को गोसेवा का मौका भी मिलता है। सभी भक्तों को गोशाला में पल रही गायों के दूध से बनी लस्सी (छाछ) प्रसाद के रूप में दी जाती है। इस छाछ रूपी प्रसाद को पाकर श्रद्धालु अपने आप को मंदिर का और गोशाला का कृतज्ञ मानते हैं। अब धीरे-धीरे यहां भक्तों की संख्या भी बढ़ने लगी है।

- राजकुमार यादव फाजिलपुर, भक्त

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