जोगिया द्वारे-द्वारे: सत्येंद्र सिंह

जोगिया द्वारे-द्वारे: सत्येंद्र सिंह

जब कोरोनारोधी टीका आराम से लग रहा था तो लोग भ्रमित थे टीके की उपयोगिता पर सवाल खड़े कर रहे थे। कइयों ने तय कर रखा था कि जब मोदी जी टीका लगवा लेंगे तो वह भी टीकाकरण केंद्र पर जाएंगे।

JagranFri, 07 May 2021 04:17 PM (IST)

कोरोना का दंश बढ़ा तो टीके कर सुध आई

जब कोरोनारोधी टीका आराम से लग रहा था तो लोग भ्रमित थे, टीके की उपयोगिता पर सवाल खड़े कर रहे थे। कइयों ने तय कर रखा था कि जब मोदी जी टीका लगवा लेंगे तो वह भी टीकाकरण केंद्र पर जाएंगे। टीका लगाने वाली टीम सुबह से शाम तक इंतजार करती थी, मगर लोग नहीं आते थे। अब जब कोरोना वायरस ने जवान लोगों की जिदगी लीलना शुरू कर दिया है तो अहसास हुआ कि कम से कम एक ही टीका लगवा लेते तो भी ठीक होता। अब टीकाकरण केंद्र की तस्वीर भी उल्टी नजर आती है। टीके सौ होते हैं और लगवाने वाले एक हजार से अधिक लोग पहुंच रहे हैं। भीड़ लगाने से कोरोना को हवा मिल रही है। सिविल सर्जन डा. विरेंद्र यादव अपील कर रहे हैं कि टीका सभी को लगेगा पर बारी आने पर। लोग बेवजह टीका लगवाने वाले लोगों की लाइन में न लगें।

चेहरा, थैला देख मिलती है जगह

शहर के कई अस्पतालों में चेहरा व थैला देखकर कोविड मरीज भर्ती किए जा रहे हैं। पोल न खुले इसके लिए कई अस्पताल प्रशासन को उपलब्ध बेड की संख्या भी नहीं बता रहे हैं। नियम यह है कि मरीज को तुरंत इमरजेंसी में भर्ती कर बीमारी के अनुरूप इलाज किया जाना चाहिए। साउथ सिटी निवासी शिवानी बताती हैं कि कोरोना संक्रमण की चपेट में आने से उनके भाई वरुण की हालत गंभीर हुई तो वह यहां के नामी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में लेकर पहुंचीं। मरीज को गार्ड ने अंदर जाने से रोक दिया। डाक्टर यह कहते रहे कि ओपीडी सिस्टम से प्रवेश मिलेगा। शिवानी बहुत गिड़गिड़ाईं मगर चार घंटे तक डाक्टर ने हाथ नहीं लगाया। उनका भाई एंबुलेंस में पड़ा रहा, जबकि उनके सामने ही उत्तर प्रदेश के एक नेता को हालत ठीक होते हुए भी भर्ती कर लिया गया। ओपीडी की सिफारिश की जरूरत भी नहीं समझी गई। अधिकारी की नहीं, जनता की सुने सरकार

प्रदेश में गुरुग्राम की हालत सबसे खराब है। प्राइवेट अस्पताल दूसरे राज्यों के मरीजों से भरे पड़े हैं। स्थानीय लोगों को अस्पतालों में जगह मिल नहीं रही है। कोरोना संक्रमित सक्रिय मरीजों की संख्या 35 हजार से अधिक हो चुकी है। होमआइसोलेशन में रहकर इलाज कराने वाले मरीजों में से 10 प्रतिशत की सांस कृत्रिम प्राणवायु के सहारे चल रही है। हालात सुधारने के लिए मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने जिले की जिम्मेदारी खुद संभाल रखी है। इसके बाद भी हालत नहीं सुधर रही। भाजपा कार्यकर्ता फेसबुक पर पोस्ट डाल रहे हैं कि अधिकारी कुछ नहीं कर रहे हैं। लोग मर रहे हैं मगर आक्सीजन सिलेंडर लेने के चक्कर में तीमारदारों का दम निकल रहा है। चेहरा देखकर सिलेंडर दिए जा रहे हैं। कोविड अस्पतालों को तैयार करने में भी युद्ध स्तर पर काम नहीं हो रहा है। अफसरों की फौज बढ़ रही पर काम तेजी से नहीं हो रहा है। आपदा के असुर भी दिखने लगे रंग

महामारी से वही देश पहले जंग जीत जाता है, जिसके हर नागरिक में लड़ने की ललक होती है। इसमें कोई शक नहीं कि संकट की इस घड़ी में कई लोग तन-मन-धन से लोगों की मदद कर रहे हैं, मगर आपदा में कुछ असुर भी पैदा हो गए हैं। कोई आक्सीजन सिलेंडर की कालाबाजारी कर रहा है तो कोई रेडमेसिविर इंजेक्शन की। एक प्राइवेट अस्पताल का सुपरवाइजर अस्पताल से हेराफेरी कर इंजेक्शन लेकर आता था, उसकी पत्नी सोसायटी में जरूरतमंद लोगों को 40 से 50 हजार रुपये में इंजेक्शन बेचती थी। अहसान ऊपर से जताती थी कि हमारे साहब ने किसी तरह जुगाड़ कर लिया। महामारी के भीषण दौर में कई एंबुलेंस चालक कोरोना गिद्ध बन गए। पालम विहार निवासी सोनू की पत्नी का देहांत हो गया। अस्पताल से मदनपुरी स्थित मोक्ष स्थल तक लाने के लिए एंबुलेंस चालक ने 15 हजार ले लिए, जबकि दूरी महज सात किलोमीटर ही है।

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