शौर्यगाथा: नक्सलियों से लड़ते-लड़ते शहीद हुए थे गोपाल भाटी

छांयसा निवासी गोपाल भाटी के बलिदान को कई साल बीत गए हैं लेकिन आज भी उनकी मां किरण बाला अपने बेटे के चित्र को रोज निहारती रहती हैं।

JagranWed, 28 Jul 2021 05:14 PM (IST)
शौर्यगाथा: नक्सलियों से लड़ते-लड़ते शहीद हुए थे गोपाल भाटी

सुभाष डागर, बल्लभगढ़ (फरीदाबाद): देश की रक्षा करते हुए कई जवानों ने बलिदान दिया है। इनमे गांव छांयसा निवासी गोपाल भाटी भी थे। उनके बलिदान को कई साल बीत गए हैं, लेकिन आज भी उनकी मां किरण बाला अपने बेटे के चित्र को रोज निहारती रहती हैं। कई बार उनकी आंखें नम हो जाती हैं, लेकिन वे बेटे की शहादत पर गर्व करती हैं। अब सेना के लिए अपने पोते को तैयार कर रही हैं। परिचय :

गोपाल भाटी का जन्म सेना में हवलदार विरेंद्र सिंह के घर गांव छांयसा में एक अप्रैल 1981 को हुआ। 12वीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान गोपाल 7 अप्रैल 1999 को सेना में भर्ती हो गए। 27 अप्रैल 2001 को गांव बाद जिला मथुरा उत्तर प्रदेश की रहने वाली मंजू से शादी हो गई। उनकी एक बेटी पैदा हुई थी जिसका नाम खुशी है, अब वह 12वीं कक्षा में पढ़ रही है। 31 अक्टूबर 2001 को असम में नक्सलवादियों की गोली लगने से बलिदान हो गए। उनके परिवार में आठ युवा सेना में भर्ती होकर देश सेवा कर रहे हैं। शौर्य गाथा

बलिदानी के पिता विरेंद्र सिंह बताते हैं कि बलिदानी बेटे के साथियों ने उन्हें बताया था कि किस तरह बेटे ने अदम्य साहस का परिचय दिया था। उनके अनुसार बेटे गोपाल भाटी की असम के नलवाड़ी जिले में पोस्टिग थी। 31 अक्टूबर-2001 को उनकी पांच सदस्यीय टीम की नक्सलवादियों से मुठभेड़ हो गई। तीन नक्सलवादियों को ढेर कर दिया। इसके बाद उनकी टीम एक नदी के पुल पर गश्त कर रही थी। वे पानी पीने के लिए नदी में नीचे चले गए। तभी नक्सलवादियों ने उन्हें गोली मार दी और वे बलिदान हो गए। पहली नवंबर को उनका पार्थिव शरीर सरकारी विमान से दिल्ली लाया गया। दो नवंबर को राजकीय और सैनिक सम्मान के साथ गांव में अंतिम संस्कार किया गया। उनके अंतिम संस्कार के मौके पर राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकारी, आसपास के हजारों लोगों की भीड़ जुटी। चारों तरफ जब तक सूरज-चांद रहेगा, गोपाल भाटी तेरा नाम रहेगा जैसे नारों से वातावरण गूंज रहा था। उस ²श्य को याद कर अपने बेटा पर फक्र होता है। गांव में बेटे का स्मारक बनवाया गया है। उन्होंने बताया कि अब स्मारक की तरफ कोई ध्यान नहीं देता। गांव के शरारती तत्वों ने गमले तोड़ दिए हैं। पंचायत साफ-सफाई का भी ध्यान नहीं रखती। मेरे दो पोते और दो पोती हैं। पोता गौरव छठी कक्षा में पढ़ता है। उसे सेना में भेजा जाएगा, जिससे वह भी देश की सेवा कर सके। मुझे अपने बेटे गोपाल के बलिदान पर बहुत गर्व है, उसने पीठ नहीं दिखाई, वह लड़ा और उसने लड़ते-लड़ते बलिदान हो गया।

-किरण बाला, बलिदानी की मां

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