एफपीओ बनाकर सरकारी योजना का उठाया लाभ, गड़बड़ी की आशंका

किसान संगठित हों। अपना उत्पाद खुद बेचें। इसके लिए केंद्र की भाजपा सरकार ने करीब पांच साल पहले प्रयास शुरू कर दिए थे। किसानों को संगठित करने के लिए एफपीओ यानी किसान उत्पादक समूह बनाने शुरू कर दिए। सरकार ने समूह बनाने के लिए स्पेशल नोडल अधिकारी नियुक्त किए।

JagranTue, 14 Sep 2021 09:47 PM (IST)
एफपीओ बनाकर सरकारी योजना का उठाया लाभ, गड़बड़ी की आशंका

राजेश भादू, फतेहाबाद : किसान संगठित हों। अपना उत्पाद खुद बेचें। इसके लिए केंद्र की भाजपा सरकार ने करीब पांच साल पहले प्रयास शुरू कर दिए थे। किसानों को संगठित करने के लिए एफपीओ यानी किसान उत्पादक समूह बनाने शुरू कर दिए। सरकार ने समूह बनाने के लिए स्पेशल नोडल अधिकारी नियुक्त किए। किसान उत्पादक समूह बनाने के अधिकारियों ने सरकार की महत्वाकांक्षी योजना को गंभीरता से नहीं लिया। विभाग के निर्धारित कलेस्टर में एक समूह बनाने के लिए एक ही परिवार के लोगों को प्राथमिकता दे दी। इससे समग्र किसानों को लाभ नहीं मिल पाया। अब भाजपा नेताओं ने इसकी जांच की मांग करते हुए सीएम आफिस में शिकायत की है।

किसान उत्पादक समूह बनाने के लिए बागवानी विभाग ने पहले कलेस्टर बनाए थे। इसके लिए जिले के प्रत्येक गांव के किसानों को जोड़ना था। लेकिन बागवानी अधिकारी व कुछ किसानों ने मिलकर गड़बड़ी कर दी। एक एफपीओ में बोर्ड आफ डायरेक्टर एक ही परिवार के सदस्य अधिक बन गए। बागवानी विभाग के मार्फत बने ये समूह में बागवानी अधिकारियों ने भी एतराज जताने की बजाए ऐसे लोगों को प्राथमिकता दी जो पहले ही सरकारी अनुदान व अन्य योजनाओं का लाभ उठाने में सक्रिय रहते है। ऐसे संगठित पारिवारिक लोगों के ही समूह गठित कर दिए। इससे वास्तविक किसान को कार्य करना चाहते थे वे सरकारी अधिकारियों की वजह से वंचित रह गए। ऐसे में 33 गठित एफपीओ में से अधिकांश की टर्न ओवर तो दूर की बात है। मिलकर व्यवसाय शुरू तक नहीं कर पाए। जबकि सरकार ने इन पर 50 हजार से लेकर एक लाख रुपये खर्च कर दिया। अब इनसे जुड़े कई किसान सरकार का विरोध कर रहे है। एक एफपीओ गठित करने पर आता है 50 से 70 हजार रुपये का खर्च

किसान उत्पादन समूह के गठित करने पर 50 से 70 हजार रुपये का खर्च आता है। इसमें 25 से 30 हजार रुपये सीए पंजीकरण के लेते है। इसके अलावा अन्य दस्तावेज भी रुपये खर्च होते है। जो सरकार ही वजन करती है। ऐसे में जिन्होंने पहले विभाग के अधिकारियों के साथ मिलीभगत करके एफपीओ में परिवार के लोगों को डायरेक्टर बना गए। उनको एक भी रुपये खर्च नहीं हुआ। जो पूंजी निवेश के नाम पर रुपये लिए गए है। वे एफपीओ के शेयर बढ़ने से दोगुने ही होंगे। किसानों द्वारा गठित एफपीओ को नहीं देते अधिकारी तवज्जो

एक तो अधिकारी एफपीओ बनाने में गड़बड़ी की है। वहीं जो किसान मिलकर अपने खुद के रुपये खर्च करके एफपीओ बनाते है उनको तवज्जो नहीं देते। अधिकारी उनको जानबूझकर हर प्रकार के लाभ से वंचित रखते है। भाजपा नेताओं का कहना है कि उनमें पास किसानों की भी शिकायत आई है। जिन्होंने खुद रुपये लगाकर एफपीओ बनाया। लेकिन उनको संबंधित अधिकारी अपने विभाग से अनुमोदित करने तक तैयार नहीं।

बिचौलिया प्रथा को खत्म करने के लिए शुरू किए गए थे एफपीओ

सरकार ने एफपीओ की शुरुआत बिचौलिया प्रथा खत्म के लिए की थी। इससे किसान व उपभोक्ता दोनों को लाभ मिलता है। फिलहाल किसान परचून सिस्टम से सामान खरीदते हुए थोक में बेच रहे है। जो अर्थशास्त्र के अनुसार गलत है। सरकार का प्रयास था कि किसान संगठित हो। अपनी खेती के लिए सामान थोक में खरीद बाद में परचून में बेचे। मंडी में होने वाली शोषण से बचे। खुद की मंडी तैयार करें। इसकी शुरूआत बागवानी यानी फल व सब्जी की खेती करने वाले किसानों से की।

सरकार ये देती है लाभ

जिन किसानों ने एफपीओ बनाए हुए है। उनको सरकार खेती के लिए कृषि यंत्र खरीदने, कोल्ड स्टोर व फूड प्रोसेसिग प्लांट लगाने पर करोड़ों रुपये अनुदान देती है। एक एफपीओ में 50 से लेकर 150 किसान होने पर 5 करोड़ रुपये तक का अनुदान है। इसके अलावा अनाज मंडियों व सब्जी मंडियों में अनुदान पर बूथ व दुकान देने का भी प्रावधान। एफपीओ से किसान दूसरे किसानों से फसल खरीदते हुए सरकार को भी बेच सकते है। गत सीजन में कई एफपीओ के मार्फत गेहूं खरीदी थी।

जिले में 33 एफपीओ गठित : नोडल अधिकारी

जिले में 33 एफपीओ कार्य कर रहे है। जांडली व साधनवास के एफपीओ ने कार्य शुरू कर दिया है। नए किसानों को मौका देने के लिए खंड वाइज एफपीओ गठित किए जाएंगे। जो एक खंड में एक ही एफपीओ होगा। ये वहीं गठित होगा, जहां पर पहले एफपीओ नहीं होगा। हमने सही से एफपीओ बनाए है।

- लक्ष्मी, नोडल अधिकारी, किसान उत्पादक समूह, बागवानी विभाग।

पूरे जिले में बने एफपीओ की जांच की मांग : सिहाग

पूरे जिले में जो बागवानी विभाग द्वारा एफपीओ बनाए गए है। उनकी जांच की मांग की है। इसके लिए गत दिनों मुख्यमंत्री मनोहर लाल के ओएसडी भूपेश्वर दयाल व वरिष्ठ आइएएस अधिकारी वी उमाशंकर को शिकायत सौंपी। मेरा कहना है कि अधिकारियों ने एफपीओ में एक ही परिवार के लोग शामिल कर दिए। जबकि ये एफपीओ सहकारी समिति की दर्ज पर पूरे क्षेत्र के लोग शामिल होने थे। ऐसे में संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है। इनमें अधिकांश ऐसे किसान है जो एक तरफ सरकार के नए कानूनों का विरोध कर रहे है। जिनमें एफपीओ को बढ़ाव देने का प्रावधान है। दूसरी तरफ एफपीओ गठित करके सरकारी योजना का लाभ भी उठा गए।

- अनिल सिहाग, जिला उपाध्यक्ष, भाजपा फतेहाबाद।

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