यू-ट्यूब पर देखकर बन गया अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज

संजू कुमार, अंबाला

हौसला बुलंद हो तो आपको अपनी मंजिल पाने से कोई भी नहीं रोक सकता। अंबाला के सरबजोत सिंह ने भी अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए अलग तरह का जुनून और जज्बा कम नहीं होने दिया। लक्ष्य को हासिल करने में रुकावट भी आई, लेकिन इरादा मजबूत था। सरबजोत सिंह ने यू-ट्यूब देखकर शूटिग की बारीकियों को जाना और फिर उसमें अपना करियर बनाने की ठान ली। सुबह-शाम घंटों मेहनत कर खुद को मजबूत किया। आज वह देश ही नहीं विदेशों में परचम लहरा रहा है।

गांव धीन के किसान जितेंद्र सिंह ने अपने बेटे को उसके मुकाम पर पहुंचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। सरबजोत के मामा निशानेबाज थे। जब सरबजोत स्कूल में कक्षा छह का छात्र था, तब उसे निशानेबाजी का शौक चढ़ा। उसने यू-ट्यूब पर निशानेबाजी के तमाम जानकारियां हासिल कीं और शूटिग की बारीकियों को जाना। उसके बाद मामा से कहा कि वह भी निशानेबाजी में करियर बनाना चाहता है। उसके मामा ने शूटिग कोच अभिषेक राणा से की रेंज में प्रेक्टिस कराई।

सरबजोत ने सबसे पहला जिला स्तर पर सिल्वर मेडल हासिल किया। उसके बाद स्टेट और नेशनल में मेडल हासिल कर शहर का मान बढ़ाया। गांव से 20 किलोमीटर दूर कैंट की शूटर्स टेरिस सेंटर फीनिक्स शूटिग रेंज में रोजाना 6 से 8 घंटे प्रेक्टिस करता था। घर से सुबह खाना लेकर निकलता था और देर शाम को वापस लौटता था। नेशनल में गोल्ड मेडल हासिल करने के बाद वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने लगा। यहीं से टीम इंडिया में चयन हुआ। उसके बाद सरबजोत ने अंतरराष्ट्रीय उडान भरी।

महज 18 साल की उम्र में सरबजोत ने देश ही नहीं विदेशों में जाकर खुद को साबित कर दिखाया। आईएसएसएफ व‌र्ल्ड शूटिग चैंपियनशिप में अचूक निशाने के साथ दूसरे देशों के खिलाड़ियों को चुनौती दी। जर्मनी, ताइपे के साथ-साथ दोहा में गोल्ड मेडल लेकर शान से तिरंगा लहराया। 10 मीटर एयर पिस्टल में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 12 मेडल हासिल किए। अचूक निशाना लगाने में माहिर

सरबजीत सिंह चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज में बीए प्रथम वर्ष में पढ़ रहा है। दैनिक जागरण से बातचीत में उन्होंने बताया कि उसने ओलंपिक में गोल्ड मेडल हासिल करना अपना लक्ष्य तय कर रखा है। इसके लिए वह विदेशों में भी ट्रेनिग ले रहा है। सरबजोत सिंह ने कहा कि मुझे पूरी उम्मीद है कि ओलंपिक में मेडल लाकर तिरंगा लहराऊंगा। साथ ही उसने युवाओं को प्रेरणा दी कि खेल को अनुशासन और ईमानदारी के साथ खेलें। जब मैं निशाना लगाता हूं तो टारगेट पर ही पूरा फोकस रहता है, प्रतिद्वंदी पर नहीं। बस अपने इवेंट में हमेशा कुछ अलग और बेहतर करना होता है, जो मैंने किया। अब धीन गांव की पहचान सरबजोत के नाम से होने लगी है। गांव के लोग भी सरबजोत की इस उपलब्धि से काफी खुश हैं। उनको पूरी उम्मीद है कि वह ओलंपिक खेलों में भी भाग लेगा और पदक जीतकर तिरंगा लहराएगा।

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