मिमी को लेकर काफी एक्साइटेड हैं पंकज त्रिपाठी, कृति सेनन के साथ है अच्छा बॉन्ड

कोरोना काल में जब सिनेमाघर बंद थे तब भी पंकज त्रिपाठी दर्शकों से रूबरू होते रहे। उनकी फिल्में ‘गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल’ ‘लूडो’ ‘कागज’ और वेब सीरीज ‘मिर्जापुर 2’ सहित कई प्रोजेक्ट ओटीटी पर रिलीज हुए। अब वह फिल्म ‘मिमी’ में कृति सैनन के साथ नजर आएंगे।

Pratiksha RanawatFri, 23 Jul 2021 08:24 PM (IST)
पंकज त्रिपाठी की तस्वीर, फोटो साभार: Instagram

 स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। कोरोना काल में जब सिनेमाघर बंद थे तब भी पंकज त्रिपाठी दर्शकों से रूबरू होते रहे। उनकी फिल्में ‘गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल’, ‘लूडो’, ‘कागज’ और वेब सीरीज ‘मिर्जापुर 2’ सहित कई प्रोजेक्ट ओटीटी पर रिलीज हुए। अब वह फिल्म ‘मिमी’ में कृति सैनन के साथ नजर आएंगे। यह 30 जुलाई को जियो सिनेमा और नेटफ्लिक्स पर रिलीज होगी। ‘मिमी’ सरोगेसी (किराए पर कोख लेना) के मुद्दे पर आधारित है। बीते एक साल के अनुभव, ‘मिमी’ और आगामी प्रोजक्ट्स को लेकर पंकज से स्मिता श्रीवास्तव की बातचीत के अंश...

पिछले एक साल के घटनाक्रम ने बतौर इंसान आपको कितना बदला?

जीवन में थोड़ा ठहराव आ गया है। जीवन कितना क्षणभंगुर है। उसमें हम गुस्सा, क्रोध एकदूसरे के प्रति कटुता पाले रहते हैं। इस वक्त ने ज्यादा उदार और समझदार बनाया। ज्यादा संवेदनशील बनाया।

सिनेमा में आप जिन किरदारों में दिखते हैं, उससे काफी अलग वेब सीरीज में आपकी छवि दिखती है?

यह महज संयोग है। मुझे अलग-अलग किरदार चाहिए ताकि मेरी दिलचस्पी परफार्मेंस में बनी रहे। हां, फिल्मों में देखें तो ‘गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल’ हो या ‘मिमी’, मुझे वरायटी किरदार मिल रहे हैं। ग्रे, डार्क या लाइट हार्टेड किरदार मिल रहे हैं। यह सुखद है।

यह फिल्म सरोगेसी से जुड़े किन मुद्दों को उठा रही है?

मुख्य रूप से यह एक मनोरंजक फिल्म है। यह मनोरंजन करते हुए आहिस्ता से आपके कान में मैसेज दे देती है। बिना चिल्लाए बहुत जरूरी बात कह जाती है। फिल्म में बिना प्रवचन दिए, भाषण दिए, हम एक जरूरी बात कह रहे हैं।

संदेश प्रधान फिल्में अब ज्यादा बन रही हैं...

सिनेमा बहुत बड़ा मीडियम है, उसे सिर्फ मनोरंजन पर हमें खत्म नहीं करना चाहिए। उसके साथ संदेश भी होना चाहिए भले ही वह सब टेक्स्ट के तौर पर हो। वैसे हर कहानी में एक संदेश तो होता ही है।

‘मिमी’ में क्या खास लगा जो इस फिल्म को स्वीकृति दी?

इस फिल्म के निर्माता दिनेश विजन मेरे करीबी हैं। हमने साथ में ‘लुकाछुपी’ और ‘स्त्री’ की थी। शुरुआत में मैं कहानी सुनकर द्वंद्व में था। उन्होंने कहा कि आप निश्चिंत रहिए। मैं उनपर भरोसा करता हूं तो निश्चिंत हो गया। शूटिंग में मजा आया।

इंडस्ट्री में कहते हैं कि दोस्ती बहुत ज्यादा नहीं चलती। एक प्रोजेक्ट के बाद खत्म हो जाती है...

नहीं ऐसा नहीं है। दोस्ती का प्रोजेक्ट से कोई लेना-देना नहीं है। वैसे मेरा कोई दोस्त नहीं है। मुझे लाइक माइंडेड लोगों से बातचीत करना अच्छा लगता है।

राजस्थान में शूटिंग का अनुभव कैसा रहा?

मैं पहले भी वहां गया हूं। हम शेखावटी में थे। वहां झुंझुनू, चुरु, मंडावा गए। शेखावटी बहुत खूबसूरत है। वहां का आर्किटेक्चर बहुत खूबसूरत है। शूटिंग के बाद मैं रोज घूमता था। मंडवा हेरिटेज टाउन है। हम वहीं पर रह रहे थे। हमारा होटल भी सौ साल पुरानी इमारत थी। खाना भी बहुत जायकेदार लगा। शूटिंग के दौरान वहां के लोग मिलने भी आ जाते थे।

फिल्म के ट्रेलर में थप्पड़ वाला सीन करने में कितने सहज रहे?

फिल्म में सिचुएशन ही ऐसी है कि कोई भी लड़की थप्पड़ ही मारेगी। उस सीन में थप्पड़ मारने के अलावा भी बहुत कुछ है। फिल्म में बहुत सुंदर पंच है। थोड़े इमोशनल सींस हैं। उनको मेलोड्रामा से बचाना था। रियल भी लगना था। मेरे ऊपर ठप्पा लग चुका है कि बहुत अंडर प्ले करता हूं। मेरी चाहत थी कि इसमें बाउंड्री को थोड़ा बड़ा करूं, लेकिन वह मेलोड्रैमैटिक भी न लगे। इसमें मैंने अपना सुर बढ़ाया है। देखते हैं दर्शक उसे कितना पसंद करते हैं।

‘बरेली की बर्फी’, ‘लुकाछुपी’ के बाद कृति सैनन के साथ ‘मिमी’ आपकी तीसरी फिल्म है...

बहुत अच्छी बांडिंग है हमारी। परफार्मेंस के स्तर पर हम एकदूसरे को समझते हैं। इसमें मेरा और उनका रिश्ता यूनीक है। इसमें एक अलग प्योरिटी (पवित्रता) है।

फिल्म में सरोगेसी से किरदार अपरिचित है। फिल्म कहीं पीछे तो नहीं रह गई?

(गंभीर होते हुए) नहीं। उसके बारे में शहरी लोग भलीभांति परिचित हैं। अगर आप हिंदुस्तान के अंदरूनी इलाकों में जाएं तो लोग इसके बारे में नहीं जानते हैं। हमारी कहानी शेखावटी के एक छोटे से कस्बे में सेट है।

आपके लिए इमोशनल सीन करना कितना कठिन होता है?

इमोशनल सीन करना टफ होता है। उसे मैं प्रिपेयर नहीं कर पाता हूं। उसे ऑर्गेनिक ही रखता हूं। उस वक्त जो आएगा नेचुरल होगा। इमोशनल सीन की तैयारी आप क्या करेंगे? जितने इमोशनल क्षण हमारी जिंदगी में आते हैं वे अनापेक्षित होते हैं। सिनेमा में हमें रीक्रिएट करना होता है। मैं उसके लिए रिहर्सल नहीं करता हूं। सीन के समय ही उसमें उतरने की कोशिश करता हूं कि शायद मेरा इंपल्स काम कर जाए।

‘बच्चन पांडे’ में अक्षय कुमार के साथ काम का कैसा अनुभव रहा?

बहुत बढ़िया। पहली बार मैं उनसे आमने-सामने इस फिल्म में ही मिला। वह गर्मजोशी से मिले। उनका सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत तगड़ा है। उनकी कंपनी में मजा आया।

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