मानवाधिकार दिवस विशेष: त्रासदियों व मूल अधिकारों के हनन की कहानी बयां करती हैं ये फिल्में

Human Rights Day Special सामाजिक परंपराओं व सुधारों की ओट में आम आदमी के अधिकारों का हनन होने का गवाह और अधिकारों के प्रति समाज को जागरूक करने का पर्याय बनता आया है हिंदी सिनेमा। कुछ निर्देशक मूल अधिकारों के हनन की कहानी को पर्दे पर लेकर आते रहे हैं।

Ruchi VajpayeePublish:Sun, 05 Dec 2021 01:07 PM (IST) Updated:Mon, 06 Dec 2021 08:33 AM (IST)
मानवाधिकार दिवस विशेष:  त्रासदियों व मूल अधिकारों के हनन की कहानी बयां करती हैं ये फिल्में
मानवाधिकार दिवस विशेष: त्रासदियों व मूल अधिकारों के हनन की कहानी बयां करती हैं ये फिल्में

आरती तिवारी, मुंबई ब्यूरो। मानव की गरिमा पर सबसे बड़ी चोट है गुलामी, जहां गुम हो जाते हैं उसके मूलभूत अधिकार। यही वजह है कि अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने के लिए एक हो गया था देश और स्वाधीनता के बाद संविधान द्वारा पुन: संस्थापित किए गए जीवन के अधिकार। सिनेमा भी पीछे नहीं रहा और ऐसी कई फिल्में बनीं जो नागरिकों को इन अधिकारों के प्रति जागरूक करती हैं । मानवाधिकार दिवस (10 दिसंबर) पर आरती तिवारी का आलेख...

आज भी लड़ रहे हैं अधिकारों की लड़ाई

सामाजिक परंपराओं व सुधारों की ओट में आम आदमी के अधिकारों का हनन होने का गवाह और अधिकारों के प्रति समाज को जागरूक करने का पर्याय बनता आया है हिंदी सिनेमा। व्ही. शांताराम, महबूब से लेकर श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, मणि कौल, ऋषिकेश मुखर्जी, बासु भट्टाचार्य, बुद्धदेव दास गुप्त, प्रकाश झा, सई परांजपे, सुधीर मिश्रा जैसे निर्देशक मानव जीवन की त्रासदियों व उसके मूल अधिकारों के हनन की कहानी को बेबाकी से बड़े पर्दे पर लेकर आते रहे हैं। आज स्वतंत्रता के सात दशक से अधिक समय गुजर जाने के बाद र्भी हिंदी सिनेमा में अधिकारों के प्रति जागरूक करती फिल्में इस बात की गवाह हैं कि किस प्रकार आज भी समाज में मूल अधिकारों को लेकर लड़ाई जारी है।

जेहन में चिंगारी

भारत की विडंबना कहें या सामाजिक विसंगति, ‘वसुधैव कुटंबकम’ व ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ की भावनाओं से ओत-प्रोत यह देश आज भी छुआछूत, धार्मिक-जातिगत भेदभाव, बाल विवाह, भ्रष्टाचार जैसी तमाम बुराइयों में जकड़ा हुआ है। 1950 में भारतीय संविधान लागू होने व मानवाधिकारों की सूची बनने के बाद भी आज आबादी के एक बड़े हिस्से को इन अधिकारों की पूर्ण जानकारी तक नहीं है। इन मुद्दों की तपिश में मानव अधिकार पिघलते रहे हैं। यह तपिश जब फिल्मकारों के जेहन में बेचैनी पैदा करती है तो ‘दो बीघा जमीन’, ‘दो आंखें बारह हाथ’, ‘मदर इंडिया’, ‘गर्म हवा’, ‘बैंडेट क्वीन’, ‘गंगाजल’, ‘ब्लैक’, ‘वाटर’, ‘आक्रोश’ जैसी फिल्में सामने आती हैं, जो सामाजिक परंपराओं व आर्थिक सुधारों की ओट में आम आदमी के मानवीय अधिकारों के कत्ल की गवाह बनती हैं। महान निर्माता-निर्देशक व्ही. शांताराम ने तो ‘अमर ज्योति’(1935) के माध्यम से ‘स्त्री व पुरुष के अधिकारों की समानता’ का मुद्दा तब उठाया था, जब संवैधानिक रूप से ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी।

लंबे समय से संघर्ष

मानव अधिकारों का सबसे पहला अधिकार है - ‘जीने का अधिकार’। इसमें ‘कन्या भ्रूण हत्या, गर्भपात व इच्छा मृत्यु’ जैसे संवेदनशील मुद्दों से जुड़े अधिकार भी शामिल हैं। तमाम जागरूकता आयोजनों के बाद भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी रीतियां विद्यमान हैं, जिनके चलते कन्या के जन्मते ही विष देकर, सांस रोककर या दूध में डुबोकर उसे खत्म कर दिया जाता है। इस विषय पर निर्देशक मनीषा झा ने ‘मातृभूमि: ए नेशन विदाउट वीमन’ फिल्म का निर्माण किया, जो उस कड़वी सच्चाई की वीभत्सता को हमारे मन-मस्तिष्क में उड़ेल देती है। अधिकारों की घोषणा करने मात्र से उनकी सार्थकता सिद्ध नहीं होती। सिनेमा इस यथार्थ की पुष्टि ‘मदर इंडिया’ (महबूब खान), ‘अशनि संकेत’ (सत्यजीत रे), ‘अकालेन संधाने’ (रित्विक घटक) जैसी कृतियों के माध्यम से करता आया है। ये फिल्में अकाल व भूख में तड़पते लाखों मनुष्यों पर जमींदारों, साहूकारों व राजनैतिक गठजोड़ों की पड़ताल करती हैं। संविधान में मौजूद ‘जीविका उपार्जन की स्वतंत्रता का अधिकार’ पर विमल राय की फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ बेहतरीन उदाहरण है। सामंतवाद पर प्रहार करती यह फिल्म जीविका के प्रदत्त अधिकार व यथार्थ में उसे हासिल करने की जंग का प्रतिनिधित्व करती है। मधुर भंडारकर ने भी ‘ट्रैफिक सिग्नल’ व कार्पोरेट’ जैसी फिल्मों के जरिए इन मुद्दों को उठाया है।

गांधीवादी आदर्शों पर बात

अंडर ट्रायल केसों में होने वाली अमानवीय क्रूरता से सुरक्षा के उपाय संविधान में किए गए हैं। अपराधियों के जीवन पर व्ही. शांताराम ने ‘दो आंखें बारह हाथ’ का निर्माण किया था जिसमें एक जेलर छह कैदियों को गांधीवादी आदर्श ‘पाप से घृणा करो, पापी से नहीं’ के माध्यम से सुधारने का संकल्प लेता है। संविधान द्वारा प्रदत्त अमानवीय कृत्य से सुरक्षा के अधिकार से जागरूक करती प्रकाश झा की फिल्म ‘गंगाजल’ इस अधिकार के हनन की सच्ची दास्तां है। मानव अधिकारों की कड़ी में एक और महत्वपूर्ण अधिकार है- धार्मिक विश्वासों के अनुपालन का अधिकार। इस पर जोर देने के साथ ही सिनेमा सामाजिक सद्भाव की बात करता है। इनमें ‘गर्म हवा’,‘परजानिया’, ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘जख्म’ जैसी फिल्में इसकी बानगी हैं। इसी क्रम में अनुराग कश्यप की ‘ब्लैक फ्राइडे’ और राहुल ढोलकिया की ‘परजानियां’ सच्ची घटनाओं पर बनी फिल्में हैं। जिनमें धर्म के नाम पर व्याप्त खोखलापन व धर्म से जुड़े मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए मजबूत व बेहतर विकल्प तलाशने का संकेत भी मिलता है।

आज भी जारी है जंग

ऐसा नहीं है कि अधिकारों के हनन और उनके प्रति जागरूकता में कमी बीती सदी की बात है। आज भी इन पर बन रही फिल्में इस बात का प्रमाण हैं कि यह जंग अभी भी जारी है। मानवाधिकारों के प्रति जागरूक हो रहे दर्शक ऐसी फिल्मों, शार्ट फिल्म या वेब सीरीज को हाथोंहाथ लेते हैं।

अनुराग कश्यप, गुनीत मोंगा व सुनील बोहरा द्वारा निर्मित फिल्म ‘शाहिद’ मानवाधिकार वकील शाहिद आजमी की सच्ची कहानी पर आधारित है, जिनकी मुंबई में हत्या कर दी गई थी। हंसल मेहता द्वारा निर्देशित इस फिल्म में मुख्य भूमिका राजकुमार राव ने निभाई, जिसमें बड़े ही गंभीर अंदाज में मानवाधिकारों व उनके हनन को आवाज दी गई।

धर्म, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को रोकती अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘आर्टिकल 15’ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 पर आधारित है। फिल्म में शानदार अभिनय और उसकी सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस फिल्म के लिए अभिनेता आयुष्मान खुराना राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी जीत चुके हैं।

आए दिन महिलाओं के अधिकारों के हनन और समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच पर गहरी चोट करती फिल्म ‘पिंक’ सामानता के अधिकार को बयां करती है। अनिरुद्ध राय चौधरी द्वारा निर्देशित इस फिल्म ने उन महिलाओं की मदद की, जो हर दिन ऐसे शोषण का शिकार होती रहती हैं और अपने अधिकारों के लिए आवाज तक नहीं उठातीं। इसी तरह पूर्वी भारत से आई महिला के प्रति मानसिकता को भी यह फिल्म बड़ी सजगता से दर्शाती है। पुरुष प्रधान समाज के साए तले जी रही औरतों की कहानी बताती अलंकृता श्रीवास्तव की फिल्म ‘लिपिस्टक अंडर माय बुर्का’ बड़ी सच्चाई और ईमानदारी से अपनी उपस्थिति दर्ज करती है।र्

हिंदी सिनेमा ने हमेशा से ही समलैंगिक व्यक्तियों की अहमियत, समाज में उनकी स्वीकार्यता व संघर्षों को दिखाया है। मकसद हमेशा यही रहा कि समाज उन्हें भी स्वीकार करे। दीपा मेहता की ‘फायर’ से लेकर ‘मार्गरेटा विद ए स्ट्रा’, मनोज वाजपेयी अभिनीत फिल्म ‘अलीगढ़’ जैसी फिल्मों में इस हक व हकीकत को बेबाकी से दर्शाया गया है।