मेडिकल प्रोफेशन पर बनी फिल्मों की शूटिंग में क्या होती हैं चुनौतियां, जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान डा.द्वारकानाथ कोटनीस के सेवाभाव की अमर कहानी से लेकर मुंबई में हुए आतंकी हमले के दौरान घायलों की जान बचाने की डाक्टरों की अनथक कोशिशों तक मनोरंजन जगत ने चिकित्सकों के व्यवसाय के कई पहलुओं को दिखाया है।

Nazneen AhmedFri, 17 Sep 2021 10:18 AM (IST)
Photo Credit - Munnabhai MBBS Movie Poster

स्मिता श्रीवास्तव/प्रियंका सिंह, जेएनएन। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान डा.द्वारकानाथ कोटनीस के सेवाभाव की अमर कहानी से लेकर मुंबई में हुए आतंकी हमले के दौरान घायलों की जान बचाने की डाक्टरों की अनथक कोशिशों तक, मनोरंजन जगत ने चिकित्सकों के व्यवसाय के कई पहलुओं को दिखाया है। स्वतंत्रता संग्राम के कालखंड से शुरू हुआ डाक्टरों की जिंदगी पर फिल्में बनाने का यह सिलसिला आज भी जारी है, जिसमें कभी स्वाभिमान और मानवता के लिए सर्वोच्च बलिदान के रंग दिखते हैं तो कभी दिखते हैं हंसाते-गुदगुदाते और जीने की राह दिखाते संकल्पों के इंद्रधनुष।

चिकित्सा के पेशे से जुड़ी कहानियों को पर्दे पर दिखाने की चुनौतियों की पड़ताल करता स्मिता श्रीवास्तव और प्रियंका सिंह का आलेख...

मेडिकल प्रोफेशन पर बनी फिल्मों के लिए रिसर्च बेहद जरूरी है। अब दर्शक चीजों को तार्किक अंदाज में देखना पसंद करते हैं। राजू हिरानी के जेहन में ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ की कहानी उनके मेडिकल कॉलेज के दोस्तों की वजह से आई थी। फिल्म में मुन्ना भाई का किरदार निभाने वाले संजय दत्त कहते हैं कि हमने यह दिखाने की कोशिश की थी कि दवाएं जरूरी हैं, लेकिन डॉक्टर का उनके मरीजों से रिश्ता भी होना चाहिए।

वहीं अभिनेत्री रेवती और सत्यजीत दुबे अभिनीत आगामी फिल्म ‘ऐ जिंदगी’ की कहानी अंग प्रत्यारोपण की पृष्ठभूमि में सेट है। फिल्म के निर्देशक अनिर्बन खुद एक डाक्टर हैं। वह कहते हैं कि लोग मेरे साथ अपने राज और इच्छाओं को साझा करते हैं, जो जीवन और अस्तित्व को विस्तार देने की चाहत बयां करती हैं। मुझे उम्मीद है कि दर्शक अंग प्रत्यारोपण (Transplant) की अहमियत इस फिल्म के जरिए समझेंगे। मृत्यु अंत नहीं है, बल्कि यह एक नए जीवन की शुरुआत भी है।

हल्के में नहीं दिखाया जा सकता:

साल 2003 में अमिताभ बच्चन और अनिल कपूर अभिनीत फिल्म ‘अरमान’ में दोनों डॉक्टर की भूमिका में थे। इस फिल्म की लेखिका और निर्देशक हनी ईरानी हैं। वह कहती हैं कि मैं डॉक्टर बनना चाहती थी, लेकिन मेरी पढ़ाई उतनी नहीं हो सकी, क्योंकि बतौर बाल कलाकार काम करने लगी थी। फिल्म को लिखने से पहले मैं कई डॉक्टर्स, नर्सेस और पेशेंट्स से मिली थी। फिल्म में मेरे हीरो ब्रेन सर्जन होते हैं। मैंने एक बच्चे की ब्रेन सर्जरी देखी थी। बहुत मुश्किल से इजाजत मिली थी। डॉक्टर्स उस बच्चे के साथ बहुत प्यार से बात कर रहे थे। उस अनुभव से मैं कल्पना कर पाई कि डॉक्टर्स पर एक जान को बचाने की कितनी जिम्मेदारी होती है।

परफेक्ट काम करने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है। मैंने उनके पेशे और उनकी भावनाओं के बीच एक संतुलन रखा। डॉक्टर्स भी इंसान होते हैं, उनकी अपनी पसंद और नापसंद होती है। कुछ डॉक्टर्स अच्छे गायक, पेंटर होते हैं। इसलिए फिल्म में मैंने अनिल के किरदार को ओपेरा संगीत का शौकीन बनाया। फिल्म के दायरे में रहते हुए वह पहलू दिखाने की कोशिश की। जावेद साहब (जावेद अख्तर) ने फिल्म के संवाद लिखे हैं। वह सेट पर अपने सर्जन दोस्त को लेकर आए थे। ऑपरेशन के सीन के दौरान वह बताते थे कि किस शब्द का इस्तेमाल करना है, नर्स को कैसे निर्देश देना है। इन कहानियों में एक्यूरेट रहना जरूरी है। इस पेशे को आप हल्के में नहीं दिखा सकते हैं।

तकनीक और भावनाएं साथ चलती हैं:

डॉक्टर्स को भगवान की जगह रखा जाता है। लोग भूल जाते हैं कि वे भी इंसान होते हैं। ऐसे में गलतियां होना स्वाभाविक है। मेडिकल प्रोफेशन के इस पहलू को फिल्मों में कभी कामिक तो कभी गंभीर तरीके से दर्शाया गया है। फिल्म ‘गुड न्यूज’ ऐसे दो युगल के आसपास घूमती है, जो माता-पिता बनने के लिए इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) का इस्तेमाल करते हैं। इस फिल्म की लेखिका ज्योति कपूर कहती हैं कि इस कहानी की गहराई में माता-पिता बनने की वह इच्छा है, जो बहुत ही आम है। अलग-अलग पृष्ठभूमि के दो युगल माता-पिता बनने की कोशिश करते हैं। मैं दिखाना चाहती थी कि इस निजी चीज में कैसे दूसरे भी शामिल हो जाते हैं।

क्यों अब भी यह विषय वर्जित है?

मैं खुद इससे गुजरी हूं, इसलिए इसे विश्वसनीय रखना चाहती थी। इस तरह की कहानी लिखने के लिए तकनीक और इमोशंस के बीच संतुलन होना जरूरी है।

एक्सपर्ट की सलाह जरूरी: मेडिकल एरर पर बनी फिल्म ‘अंकुर अरोड़ा मर्डर केस’ वास्तविक घटना से प्रेरित थी, जिसमें आपरेशन टेबल पर एक बच्चे की मौत हो जाती है। फिल्म के निर्देशक सुहैल ततारी कहते हैं कि डाक्टर्स पूरी कोशिश करते हैं कि जो जान उनके हाथों से फिसल रही है, उसे बचाया जाए। मेरे डॉक्टर दोस्तों ने बताया था कि कई बार ओटी में बहस हो जाती है। जिंदगी न बचा पाने का गुस्सा डॉक्टर्स में भी होता है। कई बार बड़े डॉक्टर्स में यह भाव भी आ जाता है कि वे जिंदगी बचाते हैं। इन पहलुओं को हमने फिल्म में दिखाया था। यह फिल्म विक्रम भट्ट ने डॉक्टर्स से बात करके लिखी थी। हमें पता था कि हम एक मुश्किल एरिया में कदम रख रहे हैं। ओटी के दृश्यों के दौरान डॉक्टर साथ थे। एक्टर्स को ट्रेनिंग दी गई थी। यह मेरा फील्ड नहीं है, ऐसे में एक्सपर्ट्स से पूछना तो पड़ेगा ही।

फिल्म में हमने वास्तविक मेडिकल उपकरण इस्तेमाल किए, जिसका किराया काफी था। शुरू में जो पेट की सर्जरी दिखाई गई है, उसमें पेट प्रास्थेटिक मेकअप से बनाया गया था, लेकिन वह वास्तविक दिखा, क्योंकि उपकरण रियल थे। कोरोना काल में जिस तरह से डॉक्टर्स और मेडिकल स्टाफ ने काम किया है उसमें कई कहानियां हैं, जो सामने आनी चाहिए। दर्शक नई दुनिया देखना चाहते हैं। मेरा आगामी प्रोजेक्ट भी मेडिकल क्षेत्र से जुड़ा होगा। मुझे लगता है कि वास्तविक कहानियों का कनेक्शन दर्शकों से जल्दी बनता है।

कंटेंट मेच्योर होता है: ट्रेड विशेषज्ञ और निर्माता गिरीश जौहर का कहना है कि मेडिकल पेशे पर आधारित कहानियों में एक मानवीय ड्रामा बनाया जा सकता है। हिंदी फिल्म ‘दर्द का रिश्ता’ हो या हालीवुड फिल्म ‘द फाल्ट इन अवर स्टार्स’ इन फिल्मों को पसंद किया गया है। मेडिकल का कंटेंट मेच्योर होता है। इसलिए ये कहानियां डिजिटल प्लेटफॉर्म और बॉक्स ऑफिस पर चलती हैं।

‘गब्बर इज बैक’ फिल्म में अस्पताल में डॉक्टर्स पर टारगेट पूरा करने का प्रेशर दिखाया गया है। यह सोच रियलिस्टिक थी। जहां तक इन फिल्मों के बजट की बात है तो अस्पताल को कहानी के मुताबिक कैसे दिखाना है, वह कहानी पर निर्भर करता है। वह अस्पताल का एक कोना हो सकता है, एक फाइव स्टार अस्पताल भी हो सकता है। उसके मुताबिक बजट तय होता है। कोरोना काल में फ्रंटलाइन वर्कर्स की कई कहानियां सामने आई हैं, जैसे एक डाक्टर ने मरीजों का इलाज करने के लिए अपनी कार में ही क्लीनिक खोल दिया था, ये कहानियां मेकर्स को आकर्षित करेंगी। मेडिकल एक ऐसा जोन है, जिसमें कलात्मक आजादी नहीं ले सकते हैं। मानवीय भावनाओं के साथ मेडिकल के दायरे में ही रहना होता है, लेकिन रियलिस्टिक रहते हुए इन कहानियों को कॉमेडी, ड्रामा में डालने के अवसर होते हैं।

मेडिकल पर बनी चर्चित फिल्में

डॉ. कोटनीस की अमर कहानी: साल 1946 में रिलीज़ हुई इस फिल्म का निर्देशन वी शांताराम ने किया था। यह फिल्म द्वारकानाथ कोटनीस पर बनी थी, जो उन पांच फिजिशियंस में से थे, जिन्हें दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भारत से चीन मेडिकल सहायता के लिए भेजा गया था।

आनंद: अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना अभिनीत इस फिल्म में डॉक्टर और मरीज के बीच का रिश्ता दर्शाया गया और सकारात्मक नजरिया रखने की सीख दी गई थी।

खामोशी: असित सेन निर्देशित इस फिल्म की कहानी डॉक्टर नहीं, बल्कि एक नर्स के नजरिए से दिखाई गई थी। वहीदा रहमान ने नर्स का किरदार निभाया था।

एक डाक्टर की मौत: पंकज कपूर ने फिल्म में रिसर्चर की भूमिका निभाई थी, जो सेहत और परिवार को एक तरफ रखकर कुष्ठ रोग की वैक्सीन बनाता है।

दिल एक मंदिर: मीना कुमारी और राजेंद्र कुमार अभिनीत इस फिल्म में प्रेम त्रिकोण था। राजेंद्र कुमार ने डाक्टर की भूमिका निभाई थी, जो अपनी पूर्व प्रेमिका के पति का इलाज करता है। 

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