लोकसभा चुनाव 2019 : दिलचस्प है मेरठ लोकसभा क्षेत्र का सियासी सफर, कभी एक साथ यहां से जीते थे तीन सांसद

नई दिल्ली (जेएनएन)। मेरठ पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का केंद्र रहा है, इसीलिए यहां की चुनावी हलचल हमेशा से देखने लायक होती है। 17वीं लोकसभा के लिए पहले चरण में यहां होने जा रहे चुनाव में बीजेपी और बसपा ने अपने प्रत्याशियों के नाम की घोषणा कर के इस हलचल को आसमान पर पहुंचा दिया है। बीजेपी ने राजेंद्र अग्रवाल को अपने प्रत्याशी के रूप में यहां से उतारा है तो वहीं बसपा की तरफ से याकूब कुरैशी चुनाव लड़ेंगे। इस रिपोर्ट हम आपको 1952 के पहले लोकसभा चुनाव से लेकर 2014 के 16वें लोकसभा चुनाव तक का चुनावी इतिहास बता रहे हैं। इस सीट पर पहले चरण में 11 अप्रैल को मतदान होना है। 

1952 में तीन क्षेत्रों में बांटा गया इसे 
1952 में देश की पहली लोकसभा के लिए हुए चुनाव में मेरठ को तीन लोकसभा क्षेत्रों में बांटा गया था। मेरठ जिला (पश्चिम), मेरठ जिला (दक्षिण), मेरठ जिला (उत्तर पूर्व)। मेरठ पश्चिम सीट से पहली बार खुशी राम शर्मा कांग्रेस की ओर से सांसद बने। उन्हों ने निकटतम निर्दलीय प्रत्यालशी हुकम सिंह को शिकस्तर दी। मेरठ दक्षिण से कांग्रेस के टिकट पर कृष्णचंद्र शर्मा ने चुनाव जीता। यहां से उन्हों्ने भारतीय जनसंघ के हरसरन दास को हराया। मेरठ उत्तर-पूर्व से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े शाहनवाज खान यहां से सांसद बने। शाहनवाज ने अखिल भारतीय राम राज्य परिषद के सूरज बल स्वामी को 89152 वोटों के अंतर से हराया था। 

1957 में तीनों को मिलाकर एक कर दिया गया
1957 में तीनों लोकसभा सीटों को समाहित कर मेरठ लोकसभा सीट का गठन किया गया। कांग्रेस ने इस चुनाव में शाहनवाज खान को फिर से चुनाव मैदान में उतारा। शाहनवाज यहां से लगातार दूसरी बार सांसद चुने गए। उन्होंने भारतीय कम्युरनिस्टा पार्टी के बृज राज किशोर को हराया। शाहनवाज को 158280 वोट मिले थे, जबकि बृजराज किशोर को 43359 वोट मिले। वहीं, तीसरे नंबर पर अखिल भारतीय जनसंघ (बीजेएस) पार्टी के बलबीर सिंह रहे थे, जो 39298 वोट पर ही सिमट गए थे।

1962 में भी कांग्रेस ने फहराया परचम 
1962 में तीसरी लोकसभा के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस ने जीत का सिलसिला जारी रखा। कांग्रेस के खाते में दो बार जीत डालने वाले शाहनवाज खान ने तीसरी बार फिर कांग्रेस का परचम फहराया। उन्होंने क्रांतिकारी सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार महाराज सिंह भारती को हराया। शाहनवाज ने 133172 वोट पाकर जीत दर्ज की, वहीं महाराज सिंह 88017 वोट पाकर हार गए।

1967 में पहली बार कांग्रेस को मिली हार 
तीन बार लगातार जीत दर्ज कराने वाली कांग्रेस को 1967 में पहली बार मेरठ सीट पर हार का सामना करना पड़ा। 1967 में कांग्रेस के खिलाफ खड़े हुए सम्यु1क्तह सोशलिस्ट पार्टी के एम एस भारती ने शाहनवाज खान को मात दी। एक ही उम्मीदवार के बल पर लगातार तीन बार जीत हासिल करने वाली कांग्रेस के लिए यह बड़ा झटका था। एम एस भारती ने शाहनवाज खान को भारी वोटों के अंतर से हराया। भारती को जहां 146172 वोट मिले, वहीं शाहनवाज 107276 वोटों पर ही सिमट गए। यह पहली बार था जब कांग्रेस मेरठ सीट से हारी थी। 

1971 में फिर जीती कांग्रेस
चौथे लोकसभा चुनाव में करारी हार झेलने के बाद भी कांग्रेस ने हार नहीं मानी और 1971 में फिर से शाहनवाज खान को इसी सीट से उतारा। पांचवीं लोकसभा में शाहनवाज ने फिर से जीत अपने नाम लिख दी और कांग्रेस की वापसी करवाई। शाहनवाज मेरठ के पांचवें सांसद चुने गए। उन्होंने भारतीय राष्ट्री य कांग्रेस (ऑर्गनाइजेशन) उम्मीदवार हरी किशन को भारी वोटों के अंतर से हराया। शाहनवाज को जहां 180181 वोट मिले, वहीं हरी किशन 98382 वोटों पर ही सिमट गए।

1977 में भारतीय लोकदल ने फहराया पताका
1977 में कांग्रेस को भारतीय लोकदल के सामने घुटने टेकने पड़े। 6वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में बीएलडी के कैलाश प्रकाश ने शाहनवाज खान का सूपड़ा साफ कर दिया। कैलाश ने शाहनवाज को 124732 वोटों के अंतर से हराया। 

मोहसिना किदवई तीन बार यहां से जीतीं
1980 में कांग्रेस ने नई उम्मीदवार मोहसिना किदवई को मेरठ सीट से उतारा। मोहसिना ने कांग्रेस को शाहनवाज की हार से उबरने में मदद की और पार्टी के नाम जीत दर्ज की। 1980 और 1984 में लगातार दो बार मोहसिना यहां से सांसद चुनी गईं। 1980 में उन्होंने जनता पार्टी (एस) के उम्मीदवार हरीश पाल को हराया और 1984 में जनता पार्टी की अंबिका सोनी को हराया। 

1989 में हरीश पाल ने मोहसिना से लिया बदला
1989 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस ने फिर से मोहसिना किदवई को खड़ा किया, लेकिन वह हार गईं। 1980 में मोहसिना से हारने वाले हरीश पाल ने ही उन्हें इस साल हराया। हरीश ने मोहसिना को भारी वोटों के अंतर से हराया था। हरीश ने 312856 वोट हासिल किए, वहीं मोहसिना 190815 वोट ही हासिल कर पाईं।

1991 में भाजपा को यहां से मिली जीत 
1991 में हुए लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने यहां से बड़ी जीत हासिल की। 1991 में बीजेपी ने अमर पाल सिंह को यहां से चुनावी मैदान में उतारा, जिन्होंने ना सिर्फ जीत दर्ज की, बल्कि 1991, 1996, 1998 में लगातार तीन बार सांसद भी चुने गए। बीजेपी के लिए जीत का खाता खोलने और लगातार तीन बार जीत दिलाने का श्रेय अमर पाल सिंह को ही जाता है। 

1999 में इस सीट ने दिया हाथ का साथ
1999 में मेरठ सीट पर हुए चुनाव में कांग्रेस ने बाजी मार ली। 1999 में कांग्रेस उम्मीदवार अवतार सिंह भड़ाना ने कांग्रेस को फिर से जीत दिलाई। लेकिन ये जीत ज्यादा लंबी नहीं चल सकी और 2004 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने बाजी मार ली।

2004 में बसपा ने जमाया कब्जा
चौदहवीं लोकसभा के लिए 2004 में हुए चुनाव में इस सीट पर बहुजन समाज पार्टी ने कब्जा जमाया। बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार मोहम्मद शाहिद ने जीत दर्ज की और मेरठ के 14वें सांसद बने। शाहिद ने राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के उम्मीदवार मालूक नागर को उन्हों ने शिकस्त दी थी। शाहिद ने जहां अपने खाते में 252518 वोट बटोरे, वहीं मालूक सिर्फ 183177 वोट की जुटा पाए। लेकिन बीएसपी के लिए ये जीत ज्यादा लंबे समय तक नहीं टिकी। 

2009 और 2014 में यहां लगातार खिला कमल 
2009 और 2014 में 15वीं और 16वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने जीत का परचम लहराया। बीजेपी के टिकट पर खड़े हुए राजेंद्र अग्रवाल यहां से दो बार सांसद चुने गए। 2009 में उन्होंने बीएसपी के मालूक नागर को हराया और 2014 में उन्होंने बीएसपी उम्मीदवार मोहम्मद शाहिद अखलाक को हराया। 

मेरठ की खासियतें
मेरठ, उत्तर प्रदेश के महानगरों में एक है। यहां भारतीय सेना की बड़ी छावनी भी है। मेरठ का सर्राफा बाजार देश के बड़े बाजारों में गिना जाता है। शहर में कुल चार विश्वविद्यालय हैं- चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, शोभित विश्वविद्यालय एवं स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय। पांडव किला, शहीद स्मारक, हस्तिनापुर तीर्थ, जैन श्वेतांबर मंदिर, रोमन कैथोलिक चर्च, सेन्ट जॉन चर्च, नंगली तीर्थ, सूरज कुंड, हस्तिनापुर सेंचुरी यहां के प्रमुख पर्यटन स्थल हैं। लखनऊ से इस शहर की दूरी 587.2 किलोमीटर है और दिल्ली से 113.4 किलोमीटर है।

 

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