कृषि कानूनों की वापसी के बाद आर्थिक सुधारों के लिए क्या है तैयारी, केंद्र और विपक्ष दोनों को देना होगा जवाब

विपक्षी दलों को इसका भी भान होना चाहिए कि कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा से वह यकायक मुद्दाविहीन हो गया है। यदि विपक्षी दल अभी भी आंदोलनरत किसान संगठनों को उकसाते रहते हैं तो इससे वे राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करते ही नजर आएंगे।

Neel RajputThu, 25 Nov 2021 12:37 PM (IST)
आखिर कृषि सुधारों के साथ अन्य आर्थिक सुधारों का भविष्य क्या है?

कृषि कानूनों की वापसी के मसौदे पर कैबिनेट की मुहर यही बताती है कि मोदी सरकार अपने वायदे को पूरा करने के लिए तत्पर है। इन तीनों कृषि कानूनों की वापसी की प्रक्रिया आगे बढ़ने के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कृषि सुधारों के साथ अन्य आर्थिक सुधारों का भविष्य क्या है? इस सवाल का सकारात्मक जवाब सामने आना चाहिए- न केवल सत्तापक्ष की ओर से, बल्कि विपक्ष की ओर से भी, जिसने अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों को पूरा करने की जिद में मुट्ठी भर किसान संगठनों के साथ मिलकर किसान हितों की बलि ले ली।

विपक्ष को यह आभास जितनी जल्दी हो जाए, उतना ही अच्छा कि उसने अपनी सस्ती राजनीति से देश और विशेष रूप से उन किसानों का अहित ही किया, जिनका वह हितैषी होने का दावा कर रहा है। विपक्षी दलों को इसका भी भान होना चाहिए कि कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा से वह यकायक मुद्दाविहीन हो गया है। यदि विपक्षी दल अभी भी आंदोलनरत किसान संगठनों को उकसाते रहते हैं तो इससे वे राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करते ही नजर आएंगे। यह सही समय है कि वे किसान संगठन, सामाजिक एवं आर्थिक समूह और राजनीतिक दल आगे आएं, जो कृषि कानूनों को सही मान रहे।

सुधारों को लेकर जैसी नकारात्मक राजनीति देखने को मिल रही है, उसे देखते हुए ऐसा करना और इस क्रम में सही एवं गलत के प्रति आवाज उठाना आवश्यक हो गया है। यदि ऐसा नहीं किया जाएगा तो कल को अन्य सुधारों के प्रति भी वैसा ही अतार्किक विरोध देखने को मिल सकता है, जैसा कृषि कानूनों के मामले में देखने को मिला। नि:संदेह यह भी समय की मांग है कि कृषि कानूनों की समीक्षा करने वाली समिति की जो रपट सुप्रीम कोर्ट के पास है, वह सार्वजनिक की जाए, ताकि इन कानूनों पर नए सिरे से बहस हो सके। इसके साथ ही इस सवाल का जवाब भी सामने आना चाहिए कि आखिर सुप्रीम कोर्ट ने कृषि कानूनों की समीक्षा पर विचार क्यों नहीं किया? यदि यह काम किया गया होता तो शायद जो दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बनी, उससे बचा जा सकता था। जो भी हो, मोदी सरकार को संसद के आगामी सत्र में यह प्रदर्शित करना होगा कि वह अपने सुधारवादी एजेंडे पर न केवल कायम है, बल्कि उसे आगे भी बढ़ाती रहेगी।

सुधारों के प्रति प्रतिबद्धता का परिचय देना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि कृषि कानूनों की वापसी के बाद यह अंदेशा उभर आया है कि कहीं अन्य सुधारों का रास्ता भी तो बाधित नहीं हो जाएगा? मोदी सरकार को इस संशय को दृढ़ता के साथ दूर करना होगा। इसके लिए सुधारों के सिलसिले को कायम रखना जरूरी है।

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